Shani Stotra: सूर्य पुत्र शनि को कर्मफलदाता और न्याय का देवता माना जाता है। इनकी कृपा से रंक भी राजा बन जाता है। इनकी पूजा का विशेष दिन शनिवार है, लेकिन शनिदेव का जन्मोत्सव यानी शनि जयंती भी इनकी कृपा पाने का विशेष अवसर है। आइये जानते हैं शनिवार शनि उपाय और शनि स्त्रोत पाठ जिससे कर्मफल दाता प्रसन्न होकर सुख समृद्धि और सफलता का वरदान देते हैं (Shanaishcharastotram Sampoornam)।
शनिदेव के जन्मदिवस को शनि जयंती के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में शनि जयंती ज्येष्ठ अमावस्या और दक्षिण भारत में एक महीने पहले वैशाख अमावस्या पर पड़ती है। जिस तिथि पर शनि देव का जन्म हुआ था, उसे शनि अमावस्या कहते हैं और इस साल 6 जून को पड़ रही है। शनि देव का शासन शनि ग्रह और शनिवार के दिन पर है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार शनि जयंती पर भक्त शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए उपवास रखते हैं और शनि मंदिरों में दर्शन कर भगवान शनि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि भगवान शनि निष्पक्ष न्याय में विश्वास करते हैं और अपने भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि देते हैं। वहीं जिन लोगों पर भगवान शनि का आशीर्वाद नहीं होता, उन्हें जीवन में कड़ा परिश्रम करने के बाद भी किसी प्रकार का कोई फल नहीं मिलता और वे वर्षों तक बिना कुछ प्राप्त किए परिश्रम करने के लिए विवश होते हैं।
शनि देव को प्रसन्न करने के लिए शनि जयंती पर हवन, होम और यज्ञ आदि करने का विधान है। शनि जयंती पर शनि तैलाभिषेकम और शनि शांति पूजा सबसे प्रभावशाली अनुष्ठान है। कुंडली में साढ़े साती के नाम से प्रसिद्ध शनि दोष के प्रभाव को कम करने के लिए भी शनि तैलाभिषेकम और शनि शांति पूजा महत्वपूर्ण हैं।
कोणोऽन्तको रौद्रयमोऽथ बभ्रुः कृष्णः शनिः पिंगलमन्दसौरिः।
नित्यं स्मृतो यो हरते य पीड़ा तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
सुराऽसुरा किंपुरुषोरगेन्द्रा गन्धर्व-विद्याधर-पन्नगाश्च।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
नरा नरेंद्राः पशवो मृगेन्द्राः वन्याश्च ये कीटपतंङ्गभृंङ्गाः।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
देशाश्च दुर्गाणि वनानि यत्र सेनानिवेशाः पुरपत्तनानि।
पीड्यन्ति सर्वे विषमस्थितेन तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
तिलैर्यवैर्माणगुडान्नदानैर्लोहेन नीलाम्बरदानतो वा।
प्रीणाति मन्त्रैर्निजवासरे च तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
प्रयागकूले यमुनातटे च सरस्वतीपुण्डजले गुहायाम्।
यो योगिनां ध्यानगताऽपि सूक्ष्मस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
अन्यप्रदेशात् स्वगृहं प्रविष्टस्तदीयवारे स नरः सुखी स्यातः।
गृहाद्गगतो यो न पुनः प्रयाति तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
स्रष्टा स्वयंभूर्भुवनत्रयस्य त्राता हरीशो हरते पिनाकी।
एकस्रिधा ऋग्युजः साममूर्तिस्तस्मै नमः श्रीरविनन्दनाय।।
शन्यष्टकं यः प्रयतः प्रभाते नित्यं सुपुत्रैः पशुबान्धवैश्च।
पठेत्तु सौख्यं भुवि भोगयुक्तः प्राप्नोति निर्वाणपदं तदन्ते।।
कोणस्थः पिंङ्गलो बभ्रुः कृष्णो रोद्रोऽन्तको यमः।
सोरिः शनैश्चरो मन्दः पिप्लादेन संस्तुतः।।
एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्।
शनैश्चरकृता पीड़ा न कदाचिद् भविष्यति।।
।। इति श्रीदशरथकृत शनैश्चरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।