
Pradosh Vrat 2026 : शुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य में वृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होने की मान्यता है (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)
Pradosh Vrat 2026: जून 2026 में प्रदोष व्रत 12 जून और 27 जून को रखा जाएगा। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि पर पड़ने वाले इस व्रत में भक्त उपवास रखकर शिव-पार्वती की पूजा करते हैं। 12 जून शुक्रवार को होने के कारण इसे भृगु वारा प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat 2026) कहा जाता है, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भृगु वारा प्रदोष व्रत को सुख-समृद्धि और कल्याणकारी फल प्रदान करने वाला माना जाता है।
हिंदू पौराणिक मान्यताओं और स्कंद पुराण के अनुसार, 'प्रदोष' का अर्थ संध्याकाल या रात के शुरुआती समय से है। माना जाता है कि इस त्रयोदशी तिथि पर शाम के समय भगवान भोलेनाथ अपनी अर्धांगिनी माता पार्वती के साथ अत्यंत प्रसन्न, आनंदित और उदार मुद्रा में होते हैं। इस समय जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी आराधना करता है, धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से की गई शिव आराधना से भक्तों को मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। कुछ धार्मिक ग्रंथों में प्रदोष काल में दीपदान को विशेष पुण्यदायक बताया गया है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| व्रत का नाम | शुक्र प्रदोष व्रत |
| माह | जून 2026 |
| पक्ष | शुक्ल पक्ष |
| तिथि | त्रयोदशी |
| व्रत की तारीख | 12 जून 2026 (शुक्रवार) |
| त्रयोदशी तिथि प्रारंभ | 12 जून 2026, शाम 07:36 बजे |
| त्रयोदशी तिथि समाप्त | 13 जून 2026, शाम 04:07 बजे |
| पूजा एवं व्रत का दिन | 12 जून 2026 |
| पूजा का आधार | प्रदोष व्रत की पूजा संध्याकाल में की जाती है |
| प्रदोष व्रत का प्रकार | शुक्र प्रदोष व्रत |
| धार्मिक मान्यता | शुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य में वृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होने की मान्यता है |
इसके बाद जून महीने का दूसरा प्रदोष (Pradosh Vrat 2026) व्रत 27 जून 2026 (शनिवार) को रखा जाएगा, जिसे 'शनि प्रदोष' कहा जाता है।
कोई भी श्रद्धालु इस महाव्रत को रख सकता है। स्कंद पुराण में इस व्रत को रखने के दो तरीके बताए गए हैं:
24 घंटे का कड़ा उपवास: इसमें भक्त दिन और रात पूरी तरह निराहार रहते हैं और रात में जागरण करते हैं।
संध्याकाल तक उपवास: इसमें सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखा जाता है और शाम को शिव पूजा करने के बाद व्रत खोला जाता है। देश के कुछ हिस्सों में इस दिन भगवान शिव के 'नटराज' स्वरूप की पूजा का भी विधान है।
तैयारी: सूर्यास्त से करीब एक घंटे पहले स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें।
कलश स्थापना: पूजा स्थान पर दर्भा घास पर कमल का चित्र बनाकर जल से भरा कलश स्थापित करें। भगवान शिव, माता पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय और नंदी महाराज की संयुक्त पूजा करें।
शिवलिंग का अभिषेक: शिवलिंग को दूध, दही और घी जैसी पवित्र सामग्रियों से स्नान कराएं। शिव पूजा में बेलपत्र अर्पित करने का विशेष महत्व माना जाता है।
मंत्र और कथा: पूजा के दौरान प्रदोष व्रत कथा सुनें या शिव पुराण की कहानियां पढ़ें। इसके बाद महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करें।
समापन: पूजा के बाद कलश का पवित्र जल ग्रहण करें, माथे पर भस्म लगाएं और पास के शिव मंदिर जाकर दर्शन जरूर करें।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।
Updated on:
02 Jun 2026 06:26 pm
Published on:
02 Jun 2026 06:26 pm
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