धौलपुर. जिले में सामान्य शिक्षा की बात करें या संस्कृत शिक्षा की हालात दोनो ओर खराब हैं। इसका एक कारण नहीं बल्कि सरकार से लेकर प्रशासनिक उपेक्षा, शिक्षकों की कमी और जर्जर स्कूल भवन संस्कृत शिक्षा को अंधेरे में धकेल रहे हैं। जिले में संचालित 32 राजकीय संस्कृत स्कूलों में 40 प्रतिशत यानी 94 शिक्षकों के पद रिक्त हैं।

धौलपुर. जिले में सामान्य शिक्षा की बात करें या संस्कृत शिक्षा की हालात दोनो ओर खराब हैं। इसका एक कारण नहीं बल्कि सरकार से लेकर प्रशासनिक उपेक्षा, शिक्षकों की कमी और जर्जर स्कूल भवन संस्कृत शिक्षा को अंधेरे में धकेल रहे हैं। जिले में संचालित 32 राजकीय संस्कृत स्कूलों में 40 प्रतिशत यानी 94 शिक्षकों के पद रिक्त हैं। हालात यह हैं कि कई स्कूल ऐसे भी हैं जहां एक भी शिक्षक नहीं तो कहीं केवल दो शिक्षक बच्चों को अध्ययन करा रहे हैं।
राजस्थान एकमात्र ऐसा राज्य है जहां संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए अलग से संस्कृत शिक्षा विभाग संचालित है, लेकिन इस विशेष व्यवस्था के बावजूद जिले में संस्कृत विद्यालयों की स्थिति चिंताजनक है। जहां संचालित होने वाले 32 राजकीय वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालयों में शिक्षकों का अभाव बच्चों की शिक्षा में बाधा बन रहा है। इन 32 राजकीय संस्कृत विद्यालयों में कई विद्यालयों में कुल 228 पद प्रधानाचार्य के साथ विषयाध्यापकों व प्राध्यापकों के स्वीकृत हैं, लेकिन इन स्कूलों में केवल केवल बच्चों को शिक्षण कराने 137 शिक्षक ही तैनात हैं और 94 पद यानी लगभग 40 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त हैं। ऐसे हैं जहां संस्कृत विषय पढ़ाने के लिए शिक्षक तक मौजूद नहीं हैं। जिससे देववाणी कही जाने वाली इस भाषा की उपेक्षा हो रही है। जिले में कई विद्यालय ऐसे भी हैं जहां एक या फिर दो ही शिक्षक तैनात हैं। जिस कारण अभिभावकों सहित बच्चों का भी इस प्राचीन भाषा से मोहभंग होता जा रहा है और साल दर साल संस्कृत विद्यालयों में नामांकन भी कम होता जा रहा है। जिले में संचालित 32 वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालयों में गत सत्र के नामांकन की बात करें तो तब इन स्कूलों में 3841 बच्चों नामांकन था, हालांकि इस सत्र अभी भी प्रवेशोत्सव जारी है।
भगवानपुर संस्कृत विद्यालय शिक्षक विहीन!
राजाखेड़ा उपखण्ड के खुडिला ग्राम पंचायत में आने वाले भगवानपुर राजकीय वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालय में एक भी शिक्षक नहीं है। यानी यह विद्यालय शिक्षक विहीन है। यहां तैनात एक मात्र शिक्षक की मौत के बाद से विभाग ने यहां अभी किसी भी शिक्षक को तैनात नहीं किया है, तो वहीं यहां केवल 3बच्चों का ही नामांकन है, जिसमें एक बच्चा दूसरी क्लास, एक बच्चा तीसरी और एक बच्चा 5 वीं कक्षा में अध्यययन कर रहा है। अब ऐसी स्थिति में इन बच्चों की पढ़ाई कैसे संभव है। हालांकि सुनने में आ रहा है कि इस स्कूल में डेपुटेशन के आधार पर दूसरे संस्कृत विद्यालय के शिक्षक को यहां तैनात कर रखा है। तो वहीं करीमपुर राजकीय संस्कृत विद्यालय में 35 बच्चे अध्ययनरत हैं, जबकि इन बच्चों को पढ़ाने के लिए केवल २ ही शिक्षक हैं। यह कहानी इन दो स्कूलों की नहीं जिले में ऐसी अन्य राजकीय संस्कृत विद्यालय हैं जहां केवल एक या फिर दो शिक्षक तैनात हैं जिससे शिक्षण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
कई संस्कृत स्कूलों में 10 से कम नामांकन
देखा जाए तो जिला ही नहीं अपितु राज्य भर में भी संस्कृत शिक्षा दम तोड़ती नजर आती है। प्रारंभिक स्तर पर शून्य नामांकन के कारण दर्जनों स्कूलों को बंद या शिफ्ट करना पड़ा है, वहीं सैकड़ों स्कूल जर्जर इमारतों में चल रहे हैं? इसके अलावा, शिक्षकों के हजारों पद खाली पड़े हैं और बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव परेशानियों को और बढ़ा रहा है। प्रदेश में छात्रों की घटती संख्या को देखते हुए संस्कृत शिक्षा विभाग ने ‘शून्य नामांकन’ की समस्या वाले 76 संस्कृत स्कूलों को बंद कर दिया। जिले में भी कई वरिष्ठ उपाध्याय संस्कृत विद्यालय ऐसे हैं जिनमें 10 से कम बच्चों का नामांकन है, जो कि संस्कृत शिक्षा विभाग के लिए एक चिंतनीय बात है।
जर्जर स्कूलों की नहीं हो पाई मरम्मत
झालावाड़ में जर्जर राजकीय स्कूल की इमारत गिरने से हुए हादसे के बाद राज्य सरकार हरकत में आई थी। जिसके बाद राज्य के सभी जर्जर स्कूलों सहित कक्षा कक्षों की जानकारी भी मांगी गई। राज्य सरकार ने बजट 2026-27 में जर्जर भवनों के पुनर्निर्माण और मरम्मत के लिए घोषणाएं भी की थीं। संस्कृत शिक्षा निदेशालय ने 24 मार्च को ही प्रस्ताव शासन उप सचिव को भेज दिए थे, लेकिन इन जर्जर भवनों का मानसून से पहले काम शुरू नहीं हो पाता दिख रहा। वर्तमान में हजारों छात्र ऐसे भवनों में पढऩे को मजबूर हैं, जो कभी भी हादसे का कारण बन सकते हैं। शिक्षा विभाग के आंकड़े के अनुसार राजस्थान में 44 संस्कृत स्कूल भवन पूरी तरह जर्जर हैं। इनमें पढ़ाई करना जान जोखिम में डालने जैसा है। 245 स्कूलों में 776 कमरे बेहद खराब स्थित में है और बैठने लायक नहीं है। 3239 कमरों में बहुत ज्यादा मरम्मत की जरूरत है।
राजकीय संस्कृत विद्यालयों में गत वर्ष 3841 बच्चों का नामांकन था। तो वहीं अभी स्कूलों में नामांकन कार्य जारी है। कुछ स्कूलों में शिक्षकों की कमी जरूर है।
-राघवेन्द्र शर्मा, डीईओ संस्कृत शिक्षा