
अधिकतर समय लोगों की आदत अब जूते पहनकर रखने की हो गई है। नंगे पैर चलने की आदत खत्म हो गई है। आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ, डॉ. रमाकांत शर्मा के अनुसार, ऑफिस में आठ घंटे जूते, फिर घर पर चप्पल पहनना दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। यानी पैर जमीन को छूते ही नहीं है। दिनभर में अर्थिंग (ग्राउडिंग) बेहद कम हो गई है। आजकल नंगे पैर चलना, दीवार या पेड़ों को छूना कम हो गया। ये खुश रखने के साथ रोगों से भी बचाव करते हैं।
क्या है अर्थिंग या ग्राउंडिंग?
इसका मतलब है, अतिरिक्त ऊर्जा या हीट, जिसे शरीर सहन नहीं कर पा रहा है, उसे अर्थ (धरती) पर छोड़ देता है। आपके शरीर में जो इलेक्ट्रिकल कनेक्टिविटी संग्रहित हो रही है, उसे अगर ग्राउंड नहीं करेंगे, यानी उसे शरीर से फ्लो करवाते हुए नीचे नहीं ले जाएंगे तो वह नुकसानदायक हो सकती है।
क्यों पड़ी जरूरत?
यह प्राचीन काल से ही हमारे जीवन का हिस्सा है। लेकिन बदलते परिवेश में इससे दूर हो गए हैं। यह अब फिर से चलन में आई है, क्योंकि जैसे ही लोगों ने इसे बंद किया, स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आने लगी हैं। जो एनर्जी शरीर में आ रही है, उसकी कहीं अर्थिंग नहीं हो पा रही। इससे एंजाइटी, डिप्रेशन जैसे समस्याएं होने लगी हैं।
इन बीमारियों में कारगर है अर्थिंग
जो लोग जो हमेशा डिप्रेशन में रहते हैं, जिन्हें लगातार एंजाइटी बनी रहती है, अकारण ही दूसरों पर चिल्लाने लगते हैं, ऐसे लोगों में अर्थिंग प्रभावी रहती है। कार्डियो-वेस्कुलर डिजीज के मरीजों और जिनमें पित्त (अग्नि) बढ़ता है। उनमें ग्राउडिंग के जरिए शरीर में शीतलता बढ़ती है। एसिडिटी, पित्तवृद्धि के लक्षण धीरे-धीरे कम होने लगते हैं। बर्निंग सेंसेशन, पैरों का सूनापन, गुस्सा, साइकोसोमेटिक डिसऑर्डर में भी यह कारगर है। अकारण रोना आने पर भी ग्राउडिंग के जरिए भावनाएं फ्लो करवाते हैं। सिर में जलन, दर्द और माइग्रेन की समस्या है। वे भी इस प्रक्रिया को अपनाकर राहत पास सकते हैं।
कैसे कराते हैं अर्थिंग?
1. इलाज के तौर पर अर्थिंग में पेड़ों को गले लगाया जाता है। पेड़ की जड़ें जमीन में होने व उनके इलेक्ट्रिसिटी कंडक्टर होने से वे शरीर की एनर्जी को जमीन में फ्लो कर पाते हैं।
2. नंगे पैर जमीन पर चलें। घास पर लेटें। अर्थिंग के लिए गड्ढा स्नान भी करवाया जाता है, जिसमें जमीन के अंदर बैठकर शरीर की एनर्जी का फ्लो करवाया जाता है।