दुर्ग

40 करोड़ की जमीन पर बड़ा खुलासा! रिकॉर्ड, 52 साल पुरानी रजिस्ट्री और प्लॉटिंग पर उठे कई सवाल, छिड़ी कानूनी जंग

1974 Registry Case: खैरागढ़ के एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और नजूल भूमि विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। करीब 40 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन से जुड़े मामले में 52 साल पुरानी रजिस्ट्री, सरकारी रिकॉर्ड और कथित प्लॉटिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

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Jun 04, 2026
Land Registry Controversy
Land Registry Controversy(photo-patrika)

Land Registry Controversy: छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ के बहुचर्चित एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और नजूल जमीन विवाद ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। करीब 85 हजार वर्गफीट जमीन और 40 करोड़ रुपये से अधिक की अनुमानित कीमत से जुड़े इस मामले में 52 साल पुरानी रजिस्ट्री, सरकारी रिकॉर्ड और कथित प्लॉटिंग को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। दस्तावेजों और राजस्व अभिलेखों में सामने आ रही जानकारियों के बाद मामले की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। विवाद के तूल पकड़ने के बाद अब प्रभारी मंत्री ने भी जांच के संकेत दिए हैं, जिससे पूरे मामले पर लोगों की नजरें टिक गई हैं।

Land Registry Controversy: 1974 की रजिस्ट्री बनी विवाद की वजह

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1974 में प्लॉट क्रमांक 114 और 115 की रजिस्ट्री अवयस्क स्मृति सिंह के नाम पर की गई थी। दस्तावेजों में इन भूखंडों का उल्लेख “एडवर्ड पार्क” और “बाड़ी एडवर्ड पार्क” के रूप में दर्ज बताया गया है। रजिस्ट्री में तत्कालीन राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह विक्रेता के रूप में दर्ज हैं, जबकि आम मुख्तियार के रूप में रविंद्र बहादुर सिंह के हस्ताक्षर बताए गए हैं। उस समय भूमि का मूल्य मात्र 3 हजार रुपए दर्ज किया गया था। इसी रजिस्ट्री को लेकर अब कई तरह के सवाल उठ रहे हैं।

सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और सार्वजनिक उपयोग की भूमि

विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सरकारी अभिलेखों से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित खसरों में सड़क, रास्ता, घास भूमि और जंगल जैसी प्रविष्टियां दर्ज हैं। वहीं कुछ रिकॉर्ड में प्लॉट क्रमांक 114 और 115 को एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क और उससे जुड़ी भूमि के रूप में दर्ज बताया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि भूमि सार्वजनिक उपयोग की श्रेणी में थी, तो उसका स्वरूप और उपयोग कैसे बदला गया। इस संबंध में अब तक कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

22 हिस्सों में प्लॉटिंग का दावा

संयुक्त जांच प्रतिवेदन में बताया गया है कि लगभग 85,627 वर्गफीट भूमि को विभिन्न लोगों को बेचे जाने का उल्लेख है। जानकारी के मुताबिक इस जमीन को 22 हिस्सों में विभाजित कर प्लॉटिंग की गई। वर्तमान बाजार दर के अनुसार इस जमीन की कीमत 40 करोड़ रुपए से अधिक आंकी जा रही है। इसी वजह से यह मामला अब सामान्य भूमि विवाद से आगे बढ़कर सार्वजनिक महत्व का विषय बन गया है।

पहले भी उठ चुका है मामला

यह विवाद नया नहीं है। वर्ष 2020 में तत्कालीन विधायक स्वर्गीय देवव्रत सिंह ने विधानसभा में कथित अवैध प्लॉटिंग का मुद्दा उठाया था। इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर जांच भी की गई थी। उस दौरान कुछ भूखंडों को अवैध प्लॉटिंग की श्रेणी में चिन्हित किए जाने और कुछ रजिस्ट्रियों पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई की जानकारी भी सामने आई थी।

कार्रवाई को लेकर उठ रहे सवाल

स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि सरकारी जमीनों पर छोटे अतिक्रमणों के खिलाफ प्रशासन तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन इतने बड़े और बहुचर्चित मामले में अब तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया। लोगों का कहना है कि यदि जांच रिपोर्ट और राजस्व रिकॉर्ड में गंभीर सवाल मौजूद हैं तो पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

भूमिस्वामी पक्ष ने रखा अपना पक्ष

भूमिस्वामी पक्ष के प्रतिनिधि रजत भार्गव ने कहा है कि उनके पास वर्ष 1974 की वैध पंजीकृत रजिस्ट्री, सीमांकन प्रतिवेदन और अन्य राजस्व अभिलेख उपलब्ध हैं। उनका कहना है कि भूमि लंबे समय से उनकी पत्नी स्मृति भार्गव के नाम दर्ज है और समय-समय पर उसका सीमांकन भी किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रशासन द्वारा मांगे जाने पर सभी दस्तावेज प्रस्तुत किए जाएंगे।

प्रभारी मंत्री ने दिए जांच के संकेत

मामले को लेकर जिले के प्रभारी मंत्री लखनलाल देवांगन ने कहा है कि वह कलेक्टर से चर्चा करेंगे और उपलब्ध दस्तावेजों तथा जांच रिपोर्ट का परीक्षण कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

जांच पर टिकी सबकी नजर

एक ओर 52 साल पुरानी रजिस्ट्री है, तो दूसरी ओर सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और सार्वजनिक भूमि होने के दावे हैं। निजी स्वामित्व के दावों और करोड़ों रुपए की प्लॉटिंग को लेकर उठ रहे सवालों के बीच अब पूरे मामले में प्रशासनिक जांच पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। यह विवाद केवल जमीन के स्वामित्व तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता, सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा और कानून के समान अनुपालन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से भी जुड़ गया है।

Updated on:
04 Jun 2026 12:50 pm
Published on:
04 Jun 2026 12:48 pm