Success Story: समाज की नजर में 40 की उम्र तक आते-आते एक महिला के लिए अपने पैरों पर खड़ा होने के सारे रास्ते बंद मान लिए जाते हैं। लेकिन गाजियाबाद की दीपा भाटी ने इन तमाम बंदिशों को तोड़कर साबित कर दिया कि हौसलों के लिए शादी या उम्र कोई मायने नहीं रखतीं। आज की इस स्टोरी में हम दीपा भाटी के उसी संघर्ष और सफलता के बारे में बताने जा रहे हैं।
Success Story: आज के दौर में जब भी औरतों की तरक्की की बात होती है, तो लोग अक्सर रिजर्वेशन या सरकारी योजनाओं का हिसाब लगाने लगते हैं। पर कड़वी सच्चाई ये है कि आज के समय में भी हजारों औरतें सिर्फ इसलिए पीछे रह जाती हैं क्योंकि हमारा समाज उनके लिए एक 'डेडलाइन' तय कर देता है। अक्सर सुनने को मिलता है कि शादी हो गई तो अब पढ़ाई बंद करो, या बच्चे हो गए तो अब उनकी उम्र है पढ़ने की, तुम्हारी नहीं।
समाज की नजर में 40 की उम्र तक आते-आते एक महिला के लिए अपने पैरों पर खड़ा होने के सारे रास्ते बंद मान लिए जाते हैं। लेकिन गाजियाबाद की दीपा भाटी ने इन तमाम बंदिशों को तोड़कर साबित कर दिया कि हौसलों के लिए शादी या उम्र कोई मायने नहीं रखतीं। आज की इस स्टोरी में हम दीपा भाटी के उसी संघर्ष और सफलता के बारे में बताने जा रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में पली-बढ़ी दीपा के सपने शादी के बाद मानों थम से गए थे। तीन बच्चों की मां और 18 साल तक घर की चारदीवारी में चूल्हा-चौका संभालते हुए उन्होंने हर रोज समाज के तीखे ताने सुने। जब भी दीपा पढ़ने बैठतीं, तो लोग मजाक उड़ाते थे कि जब बच्चों के पढ़ने के दिन हैं, तो मां किताबें लेकर क्यों बैठी है। यह सब सुन कर कई बार दीपा का मन भी टूटा और उनके मन में सवाल उठा कि क्या वो सही कर रही हैं, पर उन्होंने खुद को संभाला। उन्हें लगा कि अगर आज वो हार मान गईं, तो अपने बच्चों को ये कभी नहीं सिखा पाएंगी कि मुश्किलों से लड़कर अपने सपनों को कैसे सच किया जाता है।
UPPCS जैसी कठिन परीक्षा के बारे में अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि कोचिंग के बिना सफलता पाना लगभग असंभव है। लेकिन दीपा की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं। उनके पास न तो महंगी कोचिंग के लिए पैसे थे और न ही परिवार की जिम्मेदारियां छोड़कर किसी दूसरे शहर जाकर तैयारी करने का समय। इसलिए उन्होंने अपनी रसोई को ही पढ़ाई का कमरा बना लिया। दिनभर की जिम्मेदारियां निभाने के बाद, जब बच्चे सो जाते तब रात की शांति में पढ़ाई करती थीं। इसके साथ ही न उनके पास कोई नामी कोचिंग नहीं थी। इसलिए उन्होंने पुराने नोट्स, किताबों और इंटरनेट की मदद से अपनी तैयारी जारी रखी। आखिरकार उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर मन में दृढ़ निश्चय और अटूट संकल्प हो, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म और सेल्फ-स्टडी के दम पर भी किसी भी बड़ी बाधा को पार किया जा सकता है।
40 साल की उम्र को लोग अक्सर ठहर जाने या रिटायरमेंट की तैयारी की उम्र मानते हैं, लेकिन इसी उम्र में दीपा भाटी ने UPPCS परीक्षा में 166वीं रैंक हासिल कर अफसर बनकर इतिहास रच दिया। यह सिर्फ एक सरकारी नौकरी की बात नहीं थी, बल्कि उन 18 सालों के लंबे संघर्ष और समाज के हर उस ताने का करारा जवाब था जिसने उन्हें कमजोर दिखाने की कोशिश की थी। उनकी सफलता की खबर जैसे ही आई, वह रातों-रात सोशल मीडिया और अखबारों की सुर्खियां बन गईं। दीपा ने साबित कर दिया कि एक मां सिर्फ घर चलाने वाली मशीन नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बन सकती है।