कुछ कॉलेजों में इतनी भयावह रैगिंग होती है कि समझ नहीं आता इसे टॉर्चर कहा जाए या इन्ट्रोडक्शन।
रैगिंग एक ऐसा शब्द, इसे जितना भी सुना जाए उतनी ही बार मन घृणा से भर जाएगा। जी हां, रैगिंग शब्द अपने आप में ही सब कुछ कह देता है, खासतौर पर तो कुछ कॉलेजों में इतनी भयावह रैगिंग होती है कि समझ नहीं आता इसे टॉर्चर कहा जाए या इन्ट्रोडक्शन। इस विषय पर छात्रों का इंटरव्यू लेते समय कुछ ऐसी बातें सामने आईं जिन्हें सुनने की अपेक्षा तो नहीं थी लेकिन जब सुना तो दिल धक्क से रह गया।
ये कहानी प्रीतेश (बदला हुआ नाम) की है। प्रीतेश ने 2005 में इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लिया था, कॉलेज के ही हॉस्टल में उसे रूम मिल गया था। उसे हॉस्टल में आए दो या तीन दिन ही हुए थे कि होम सिकनेस के चलते उसकी तबियत काफी खराब हो गई। ठीक उसी रात को कुछ सीनियर्स उनके हॉस्टल में घुस आए और सभी जूनियर छात्रों को एक लाइन में खड़ा कर दिया गया।
प्रीतेश और बाकी जूनियर्स को बताया गया कि आज उनकी रैगिंग होगी जो भी रैगिंग नहीं देगा, उसे सीनियर्स छात्रों द्वारा सजा दी जाएगी। रैगिंग के नाम पर सबसे पहले सभी छात्रों के नाम, बैकग्राउंड और एंट्रेस एग्जाम में मार्क्स पूछे गए। इसके बाद सभी जूनियर्स को दो ग्रुप्स में बांट दिया गया। पहला ग्रुप था ठीक-ठाक लड़कों का और दूसरा ग्रुप था जिनके एंट्रेस एग्जाम में अच्छे मार्क्स आए थे और जो ज्यादा ही इंटेलीजेन्ट लग रहे थे।
जो लड़के कद-काठी में साधारण थे, उन्हें अपने से भारी और हट्टे-कट्टे लड़कों को पीठ पर उठा कर 10 कदम चलना था, जबकि हट्टे-कट्टे लड़कों को टास्क दिया गया कि वो अपने सारे कपड़े उतार कर हॉस्टल का चक्कर लगा कर आएं। इंटेलीजेन्ट छात्रों को मिलाकर बनाए गए ग्रुप को इन सबसे अलग टारगेट दिया गया। कुछ को सिगरेट और बीड़ी पीने के लिए दी गई, कुछ को किसी पोर्न मूवी की कहानी एक्शन करते हुए भाव-भंगिमा के साथ सुनाने के लिए कहा गया तो कुछ को किताब शीशे में देख कर पढ़ने के लिए कहा गया। लेकिन रैगिंग यही तक नहीं रूकी, दो तीन छात्रों ने रैगिंग का विरोध किया तो उनकी पिटाई की गई और उसके बाद जबरन उनके सारे कपड़े उतार कर हाथ ऊपर खड़े करने और मुर्गा बनने की सजा दी गई। इसके बाद उन्हें इसी हालत में एक दूसरे को प्रपोज करने के लिए मजबूर किया गया।
प्रीतेश इन सबमें सबसे ज्यादा भाग्यशाली निकला, उसकी खराब तबियत के चलते उस पर इस तरह की कोई सख्ती तो नहीं की गई लेकिन रैगिंग उसकी भी हुई। उसके एक पेज पर कम से कम सौ गालियां लिखने के लिए कहा गया। बदकिस्मती से वो 15-20 से ज्यादा नहीं लिख पाया तो सीनियर्स ने उसे एक कॉपी में गालियां लिख कर दी और वहीं पर तेज-तेज बोल कर याद करने के लिए कहा। उस पूरी रात हॉस्टल में यही चलता रहा।
इस रैगिंग से डरे कुछ लड़कों ने इंजीनियरिंग कोर्स छोड़ने का भी फैसला कर लिया और अगले ही दिन अपने घरों के लिए रवाना हो गए हालांकि बाद में किसी तरह हॉस्टल वॉर्डन और कॉलेज प्रिंसीपल के समझाने पर लौट कर आए। परन्तु क्या यही रैगिंग है, क्या यही देश के होनहारों का भाग्य है कि वो इतने सपनों और इतनी उम्मीदों के साथ पढ़ते हैं, मेरिट लिस्ट में रैंक हासिल करते हैं और कॉलेज में घुसते ही उनके साथ ये सब होता है।