Supreme Court News: 14 साल से कम उम्र के बच्चों की शिक्षा और धार्मिक संस्थानों की निगरानी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई है। कोर्ट ने बिना मान्यता वाले संस्थानों के लिए कड़े नियम बनाने की मांग को केंद्र सरकार के पास भेज दिया है। जानिए क्या था पूरा मामला।
Supreme Court: देश में 14 साल से कम उम्र के बच्चों को सामान्य शिक्षा और धार्मिक ज्ञान देने वाले सभी संस्थानों के लिए कड़े नियम बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपना अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने बिना मान्यता वाले ऐसे संस्थानों पर खुद कोई कड़ा नियम बनाने के बजाय यह मामला सीधे केंद्र सरकार के पास भेज दिया है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि, वह इस मांग पर बारीकी से विचार करे और जो भी सही हो वह फैसला ले। साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि न्याय का रास्ता एकतरफा नहीं होता है और ऐसे मामलों में कार्यपालिका यानी सरकार की भी बड़ी भूमिका होती है।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने की। जब याचिका दायर करने वाले वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी मांग पर बहुत ज्यादा जोर दिया तो जजों ने साफ कहा कि, आप ऐसे जजों की बेंच के सामने हैं जो बहुत पारंपरिक विचार रखते हैं। हम बिना सोचे समझे जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाते। कोर्ट ने इस जनहित याचिका का निपटारा करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता द्वारा 4 फरवरी 2026 को दिए गए मांग पत्र पर बारीकी से विचार करे और उस पर कोई उचित फैसला लेकर उन्हें इसकी जानकारी दे।
आजकल हर जगह प्राइवेट स्कूलों, कोचिंग सेंटरों और छोटे बच्चों के लिए प्री प्राइमरी क्लासरूम की बाढ़ सी आ गई है। ऐसे में यह बड़ा सवाल उठने लगा है कि क्या ये संस्थान बच्चों की सुरक्षा, उनके मानसिक स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और पढ़ाने के सही तरीकों का पालन कर रहे हैं। याचिका में यह चिंता जताई गई है कि छोटे बच्चों को पढ़ाई के भारी दबाव और तनाव से बचाने के लिए एक सख्त सिस्टम का होना बहुत जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका इसलिए दायर की गई थी ताकि 14 साल तक के बच्चों को पढ़ाने वाले सभी संस्थानों का रजिस्ट्रेशन कंपलसरी किया जाए और उन पर कड़ी नजर रखी जाए। याचिका में ये कुछ बड़ी बातें कही गई थीं:
शिक्षा विशेषज्ञों का भी हमेशा से यही मानना रहा है कि, शुरुआती पढ़ाई के दौरान बच्चों के मन में डर, किसी तरह का तनाव या कंपटीशन की भावना बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। इसके बजाय टीचिंग इंस्टिट्यूट्स को बच्चों के मानसिक विकास और उनमें कुछ नया सीखने की जिज्ञासा पैदा करने पर जोर देना चाहिए। 14 साल तक की उम्र के बच्चों को मुफ्त और जरूरी शिक्षा के दायरे में रखा गया है इसलिए, इनकी शिक्षा की गुणवत्ता और जवाबदेही तय करना और भी ज्यादा अहम हो जाता है।