
Sharmila Tagore On Vande Mataram: दिग्गज अभिनेत्री शर्मिला टैगोर ने राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर अपनी राय रखी है। उनका कहना है कि देश में अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए इसके शुरुआती दो अंतरों को ही अपनाया जाना चाहिए। अभिनेत्री ने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं और ऐसे में गीत के कुछ हिस्से उनकी धार्मिक मान्यताओं से मेल नहीं खाते।
शर्मिला टैगोर ने गुरुवार को आईएएनएस से बातचीत के दौरान ‘वंदे मातरम्’ को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में सभी समुदायों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखना जरूरी है। उनके मुताबिक गीत के पहले दो अंतरों में ऐसा कोई विषय नहीं है, जो अलग-अलग धार्मिक विश्वास रखने वाले लोगों के लिए असहज स्थिति पैदा करे।
अभिनेत्री ने अपनी बात रखते हुए कहा कि देश में कई लोग ऐसे हैं जो केवल एक ईश्वर में विश्वास करते हैं। ऐसे में गीत के उन हिस्सों का पाठ करना उनके लिए कठिन हो सकता है, जिनमें विभिन्न देवी-देवताओं का उल्लेख आता है। शर्मिला टैगोर का मानना है कि यदि सभी धार्मिक समुदायों को साथ लेकर चलना है तो शुरुआती दो अंतरों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
शर्मिला टैगोर की यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है, जब ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में राजनीतिक बहस भी देखने को मिल रही है। स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान गीत के पूरे संस्करण के गायन के बाद इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी तेज हुई। बीजेपी और कांग्रेस की ओर से इस विषय पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
कांग्रेस की ओर से लंबे समय से पार्टी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो अंतरों के इस्तेमाल की परंपरा का हवाला दिया गया है। वहीं बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस पर राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान नहीं दिखाने का आरोप लगाया। इस पूरे विवाद ने एक बार फिर ‘वंदे मातरम्’ के इतिहास, इसके पाठ और इसके अलग-अलग अंतरों को लेकर चर्चा बढ़ा दी है।
‘वंदे मातरम्’ को लेकर अभिनेता मुकेश खन्ना भी अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने इससे भी आगे बढ़ते हुए ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान बनाए जाने की मांग की थी। मुकेश खन्ना ने ‘जन गण मन’ को लेकर भी विवादित दावा किया था और कहा था कि ‘वंदे मातरम्’ को देश के साथ ज्यादा गहराई से जुड़ा हुआ माना जाना चाहिए।
हालांकि, राष्ट्रगान को लेकर मुकेश खन्ना के दावे पर ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। वहीं शर्मिला टैगोर की टिप्पणी मुख्य रूप से धार्मिक विविधता और गीत के पाठ को लेकर उनके व्यक्तिगत दृष्टिकोण पर केंद्रित है।
शर्मिला टैगोर की बात का मूल केंद्र भारत की धार्मिक विविधता और सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान है। उनका कहना है कि देशभक्ति की भावना को बनाए रखते हुए ऐसा रास्ता अपनाया जा सकता है, जिसमें अलग-अलग धार्मिक विश्वास रखने वाले लोग भी सहज महसूस करें।
‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से गहराई से जुड़ा गीत है और इसे लेकर लोगों की भावनाएं भी काफी मजबूत हैं। ऐसे में शर्मिला टैगोर की टिप्पणी ने एक बार फिर इस पुराने लेकिन संवेदनशील विषय को चर्चा में ला दिया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस जारी रहने की संभावना है।