कवि शिशुपाल सिंह शिशु ने देश के कोने-कोने में काव्य के माध्यम से अनोखी अलख जगाई...
इटावा. स्वर्ण भस्म के खाने वाले इसी घाट पर आएं, दाना बीन चबाने वाले इसी घाट पर आएं, गगन ध्वजा फहराने वाले इसी घाट पर आएं, बिना कफन मर जाने वाले इसी घाट पर आएं। इन सुन्दर पंक्तियों की रचना करने वाले महान कवि शिशुपाल सिंह शिशु ने देश के कोने-कोने में ऐसे काव्य के माध्यम से अनोखी अलख जगाई। उनका प्रतिनिधि काव्य ग्रंथ मरघट आज भी पाठकों में बेहद लोकप्रिय है।
स्वर्ण भस्म को खाने वाले इसी घाट पर आये
दाना बीन चबाने बाले इसी घाट पर आये।
गगन ध्वजा फहराने वाले इसी घाट पर आये।
बिना कफ़न मर जाने वाले इसी घाट पर आये।।
सोच रहा हूँ घर से मरघट की थी कितनी दूरी।
जिसको तय करने में उसने उम्र लगा दी मेरी।।
काव्य संग्रह मरघट की लाइनें
यह चंद लाइन नहीं है बल्कि जीवन दर्शन का एहसास कराने वाले काव्य संग्रह मरघट से ली गई। इटावा शहर से करीब दस किलोमीटर दूर चंबल नदी के किनारे उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश सीमा पर बसे ग्राम उदी में महाकवि शिशुपाल सिंह शिशु का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम बिहारी सिंह भदौरिया था और माता का नाम पैदेवी था। शिशुजी ने ग्राम उदी से ही प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। बाद में आगरा से नार्मल ट्रेनिंग के बाद वह प्राइमरी स्कूल के शिक्षक बने। महाकवि शिशुजी की कविताओं में चम्बल के बहते जल की स्वच्छता और गहराई है। वन प्रांत की एकांत साधना और यमुना के कछारों व ब्रज की मधुरमा, बुंदेली ठसक और कवि की भावुकता, इन सबने जैसे एक ही व्यक्ति में स्थान पाकर शिशु का निर्माण किया है।
भव्य श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन
महाकवि शिशुपाल सिंह जी शिशु के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में शिशु जी के पैतृक ग्राम उदी में भव्य श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया गया। पूरे जिले भर एवं आसपास से पधारे कवियों एवं साहित्यकारों द्वारा जहाँ अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से महाकवि को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
अर्पित की गई श्रद्धांजलि
मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सदर विधायिका श्रीमती सरिता भदौरिया द्वारा शिशु जी की प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाकर श्रद्धांजलि अर्पित की गयी। समारोह में जनपद एवं आस पास से पधारी कवियों एवं साहित्यकारों का कार्यक्रम के व्यवस्थापक सपा नेता विमल भदौरिया एवं महाकवि शिशु जी पौत्र आशीष भदौरिया द्वारा आभार व्यक्त किया गया। शिशु स्मृति समिति उदी के सौजन्य से आयोजित समारोह में विधायक श्रीमती भदौरिया ने कहा कि महाकवि जी की विशाल प्रतिमा को स्थापित के लिये सही स्थान दिलाने के साथ अगले जयंती समारोह को भव्य रूप से आयोजित किये जाने हेतु हर संभव प्रयाश किया जावेगा। विधायक ने समारोह की अध्यक्षता कर रहे ग्राम के वयोवृद्ध कैप्टन उल्फत सिंह भदौरिया एवं अध्यापक अहिबरन सिंह भदौरिया को प्रतीक चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।
लोग झूमने पर हुए विवश
शिशु जी के अवतरण दिवस समारोह में कवि रौनक इटावी द्वारा अब कहीं ना ये दिल लगे सूनी सूनी महफिल लगे तुम ही नहीं शिशु जी तो ये दुनियां छोड़ देने के काबिल लगे। कहकर श्रद्धांजलि अर्पित की गयी तो कवि राजीव राज द्वारा शिशु जी के लिखे छन्दों का स्मरण करने के साथ ही बचपन की यादों को लेकर गीत यादें झीनी, झीनी, झीनी रे सुनकर लोगों को झूमने पर विवश कर दिया। इसी प्रकार नव युवक कवि राम भदावर ने पारिवारिक संस्कृति को बचाये रखने को लेकर काव्य पाठ किया गया जिसकी काफी सराहना की गयी। समारोह में उपस्थित कवि एवं साहित्यकार कमलेश शर्मा, रोहित चौधरी, सुनील दुबे, कादिर राणा, शिव गोपाल अवस्थी, अवनीश त्रिपाठी, सुशील कुमार सम्राट आदि द्वारा काव्य पाठ कर शिशु जी को श्रध्दा सुमन अर्पित किए गए।
काव्य रचना ने लोगों की बटोरी तालियां
ग्राम उदी निवासी छात्र सत्यम भदौरिया ने अपनी काव्य रचना से लोगो की तालियां बटोरीं। समारोह का संचालन कर रहे वरिष्ठ कवि एव साहित्यकार कुश चतुर्वेदी ने महाकवि की जीवन एवं उनके द्वारा रचित रचनाओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि शिशु जी की रचनाओं में चम्बल का तेवर और यमुना का पावन पन झलकता था। उनकी रचनाओं में पांच नदियों का संगम दिखता था। उनके द्वारा शिशु जी की के छंद पढ़कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए गए।
समारोह के शुभारंभ में शिशु जी के पौत्र शिवपाल सिंह भदौरिया द्वारा शिशु जी की कई रचनाएं प्रस्तुत की गयी। समारोह का आयोजन शिशु स्मृति समिति उदी के संयोजन में शिशु जी के पौत्र आशीष भदौरिया एवं वरिष्ठ सपा नेता विमल भदौरिया द्वारा किया गया। जिसमें मुख्य सहयोगी के रूप में सिंध वाहिनी पत्रिका के प्रधान संपादक दिलीप सिंह भदौरिया , कवि शिव बहादुर सिंह भदौरिया एवं समारोह का प्राथमिक संचालन कर रहे बरिष्ठ पत्रकार महाराज सिंह भदौरिया के अलावा ग्रामीण जन रहे।
ये लोग रहे उपस्थित
समारोह में मुख्य रूप से उपस्थित बाले बुद्धिजीवी एवं संभ्रात जनों में प्रोफेशर प्रदीप भदौरिया, व्यापारी नेता अनंत अग्रवाल, आनंदपाल सिंह भदौरिया, सुशील सम्राट, बसपा नेता बीरू भदौरिया, शिक्षक नेता प्रमोद उर्फ बउआ ठाकुर, नील कंठ मंदिर इटावा के महंत रामदास जी, ज्ञानेंद्र सिंह भदौरिया, मकरंद भदौरिया, प्रधान राकेश भदौरिया, प्रधान आशु भदौरिया, गब्बर भदौरिया, सिलपू भदौरिया, विजय यादव, सत्यभान भदौरिया, रज्जन भदौरिया, रणबीर भदौरिया, देवेंद्र भदौरिया, चद्रपाल भदौरिया आदि सहित भारी संख्या में लोग रहे।
जनकवि थे शिशु जी
शिशु जी जनकवि थे। वे इटावा के पहले ऐसे कवि थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उनकी कविताओं की लगभग दस पुस्तकें दक्षिण भारत से प्रकाशित हुई। इटावा जनपद में पहली बार राष्ट्रपति पुरस्कार उन्हें 1962 में मिला। खास बात यह है कि यह सम्मान इसी वर्ष से शुरू हुआ था। इसके लिए पूरे प्रदेश से एक ही व्यक्ति को चुना जाता था। यह सम्मान पाने वाले शिशु पहले व्यक्ति बने। उनकी नीरजा, यमुना किनारे, हल्दीघाटी की एक रात, पूर्णिमा, दो चित्र आदि देश विख्यात कृतियां हैं। उनकी पनघट व मरघट रचनाएं तो इतनी व्यावहारिक हैं कि आज भी लोग उन्हें सुनकर या पढ़कर जीवन दर्शन के इतने करीब पहुंच जाते हैं जितना भागवत और रामायण सुनकर भी नहीं पहुंचते। मरघट की एक पंक्ति, नाड़ी छूट गई तो भैया मरघट को ले आये, आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। आज इटावा के बहुत कम लोग उनके नाम से परिचित हैं।
सर्पदंश से हुई थी मृत्यु
1 सितंबर 1911 में जन्मे इस कालजयी रचनाकार और शिक्षक की 27 अगस्त 1964 को सर्पदंश से मृत्यु हो गई थी। देश का पहला राष्ट्रपति पुरस्कार इटावा को दिलाने वाले शिशु का आज कोई पुरसाहाल नहीं है। उनके नाम पर इटावा में कोई सड़क, कोई कालोनी, कोई पार्क या कोई स्मारक नहीं है।