
नर्इ दिल्ली। फेस्टिव सीजन सेल की शुरुअात हो चुकी है। कर्इ आॅनलाइन व आॅफलाइन कंपनियां लगातार 'जीराे काॅस्ट र्इएमआर्इ' का आॅफर देकर ग्राहकों को लुभा रही है। EMI पर सामान खरीदने से ग्राहकों को एक मुश्त बड़ी रकम खर्च करने से राहत तो मिलती है लेकिन एक बात आपको हमेशा याद रखनी चाहिए किसी न किसी को इस जीरो काॅस्ट EMI का बोझ तो उठाना ही पड़ता है। एेसे में अापके लिए जरूरी है कि अाप इस बात को जान लें कि आखिर इस जीरो काॅस्ट EMI का बोझ किसे उठाना पड़ता है। आपको, बैंक को या फिर विक्रेता को। इस मामले से जुड़े जानकार के मुताबिक, कर्इ रिटेलर्स वित्तीय संस्थानों के साथ इस तरह का आॅफर देने के लिए टार्इअप करते हैं। लेकिन वास्तव में इन EMI पर करीब 16 से 24 फीसदी तक का ब्याज लगता है।
इसपर क्या है आरबीआर्इ का कहना
भारतीय रिजर्व बैंक ने साल 2013 में एक सर्कुलर जारी किया था जिसमें कहा गया था कि जीराे फीसदी ब्याज का कोर्इ मतलब ही नहीं बनता है। दरअसल जीरो काॅस्ट EMI स्कीम के तहत ब्याज दरों प्रोसेसिंग फीस के रूप में चार्ज किया जाता है। इसी प्रकार कुछ बैंक भी कर्इ बार रेट अाॅफ इंटरेस्ट के रूप में भी ग्राहकों को चार्ज करते हैं। चूंकि आरबीआर्इ के सर्कुलर के मुताबिक जीरो काॅस्ट EMI आैर रेट आॅफ इंटरेस्ट को कोर्इ मतलब नहीं बनता है, एेसे में कर्इ बैंक आैर रिटेलर्स का इसका फायदा ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए करते हैं।
कैसे काम करता है ये स्कीम
जैसा कि आरबीअार्इ के सर्कुलर में कहा गया है कि जीरो काॅस्ट EMI एक तरह का मार्केटिंग स्ट्रेटजी जिससे की ग्राहक आकर्षित हों। दरअसल ये स्कीम दो प्रकार से काम करता है। पहला तरीका ये होता है कि रिटेलर्स ब्याज दर की रकम आपके डिस्काउंट को कम करके वसूल लेती थी। ये रिटेलर्स बाद में इस पैसे काे बैंक या वित्तीय संस्थानों को देते हैं। वहीं दूसरा तरीका ये है कि रिटेलर्स आपसे उत्पाद के दाम में पैसे जोड़कर ब्याज की रकम वसूलता है।