Naxal News: समाज में समानता के लिए लड़-मर जाने का दावा करने वाले नक्सली अपने ही साथियों को मरता देखकर भाग खड़े हुए। बंदूक के दम पर सत्ता हथियाने वाले इनकी माओ विचारधारा वहीं ढेर हो गई।
Naxal News: समाज में समानता के लिए लड़-मर जाने का दावा करने वाले नक्सली अपने ही साथियों को मरता देखकर भाग खड़े हुए। बंदूक के दम पर सत्ता हथियाने वाले इनकी माओ विचारधारा वहीं ढेर हो गई। यही वजह रही कि फोर्स के हमले से बच निकले डिप्टी कमांडर ने 2 अन्य महिला नक्सलियों के साथ पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया है। उसके नक्सल नेताओं के कई ऐसे काले चिट्ठे भी खोले जिससे पता चलता है कि अब उनका संगठन और विचारधारा, दोनों ही खोखले हो चुके हैं।
बता दें कि सवा महीने पहले फोर्स ने भालुडिग्गी की पहाड़ियों में गरियाबंद जिले के सबसे बड़े नक्सल ऑपरेशन को अंजाम दिया था। इसमें 16 नक्सली मारे गए थे। इनमें सीसी कमेटी का मेंबर चलपति भी था। उस पर एक करोड़ इनाम था। उस दिन जेडएस स्पेशल मेंबर समेत कई बड़े नक्सली यहां से जान बचाकर भागे निकले थे। इन्हें देखकर छोटा कैडर भी तितर-बितर हो गया। इन्हीं में से तीन नक्सलियों डिप्टी कमांडर दिलीप उर्फ संतू, मंजुला उर्फ लखमी और सुनीता उर्फ जुनकी का समूह भी था।
मुठभेड़ में जवानों की एक गोली दिलीप के सिर को छूकर निकली थी। इससे उसे भी गंभीर चोटें आई थी। इनकी मानें तो 72 घंटे चली उस मुठभेड़ में उन्होंने अपने कई बड़े नेताओं को छिपकर भागते देखा। जबकि, अन्य साथी हिमल में घायल होने के बाद तड़पते हुए दम तोड़ रहे थे। इस स्थिति को देखने के बाद उन्हें समझ आया कि नक्सलियों में संगठन की बातें केवल बोलने के लिए है। मौका आता है, तो छोटे को मरने के लिए आगे कर दिया जाता है। बड़े नेता अपनी जान देखते हैं। ऐसे में तीनों ने तय कर लिया था कि अब नक्सलियों के लिए काम नहीं करना है। जीवन नए तरह से शुरू करना है।
सोमवार को गरियाबंद के पुलिस लाइन में नक्सलियों के आत्मसमर्पण के दौरान राजधानी से एडीजी (नक्सल ऑपरेशन) विवेकानंद सिन्हा, आईजी अमरेश मिश्रा के साथ सीआरपीएफ के भी कई बड़े अधिकारी पहुंचे थे। एसपी राखेचा को अभी जिले की कमान संभाले 4 महीने ही हुए हैं। इतने कम समय में नक्सल उन्मूलन को लेकर राखेचा का जैसा काम रहा है, उससे तमाम आला अफसर काफी खुश दिखे। उन्होंने इसके लिए एसपी और पूरी टीम को खूब सराहा।
सरेंडर करने वालों में 2 दिलीप और मंजुला 13 साल से एक्टिव नक्सली थे। वहीं, सुनीता भी 10 साल से संगठन से जुड़कर काम कर रही थी। इन्होंने पुलिस को बताया है कि भालुडिग्गी की घटना से पहले भी इन्हें संगठन की कई बातें पसंद नहीं थीं। जैसे भेदभाव। बड़े नक्सली नेता छोटे कैडर के नक्सलियों से नौकरों की तरह काम लेते हैं। उनसे गधे की तरह अपना सारा सामान उठवाते हैं।
जबकि, खुद फ्री हैंड जंगल में घूमते हैं। बड़े नेताओं को मोबाइल इस्तेमाल करने और न्यूजपेपर पढ़ने की आजादी है, लेकिन छोटों को नहीं। यहां तक चाय और नहाने में भी भेदभाव है। बड़े नक्सलियों को दूध वाली चाय मिलती है। छोटों को शक्कर, चायपत्ती वाली काली चाय पीनी पड़ती है। नहाने के भी अलग नियम हैं। बड़े नक्सली रोज नहा सकते हैं। बाकियों को 15 दिन में केवल एक दिन नहाना होता है।
आत्मसमर्पित नक्सलियों ने बताया कि गांवों और जंगलों में फेंके गए सरकारी पर्चों से पुनर्वास नीतियों की जानकारी मिलती थी। एक बार किसी आत्मसमर्पित नक्सली की सरकार द्वारा शादी कराने का वीडियो पेन ड्राइव पर मिला। इस पर बड़े नेताओं का कहना था कि सब दिखावा है। सरकार उनसे बुरा व्यवहार करती है। ऐसे से उनके दिमाग में कई शंकाएं थीं। लेकिन, भालुडिग्गी के हमले में अपने संगठन का असली चेहरा देखने के बाद उन्होंने सरेंडर का मन बना लिया था। जंगलों में भटकते हुए वही पुनर्वास नीति वाला पर्चा मिला, डरते हुए संपर्क किया। हालांकि, शासन-प्रशासन का असल पक्ष जानने के बाद अब उन्हें चिंता नहीं है।
एसपी निखिल राखेचा ने पत्रिका से बातचीत में कहा, सरेंडर करने वालों से 5 और नक्सलियों को हमले में गोली लगने की जानकारी मिली है। ऐसे में वे इलाज के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। उन तक यह सूचना पहुंच रही है, तो हम उनसे कहना चाहेंगे कि सामने आएं। हम उनका बेहतर इलाज करवाएंगे।
उन्हें मुख्यधारा से जोड़ते हुए उनके जीवन को भी बेहतर बनाएंगे। यही सरकार की पुनर्वास नीति है। अब बस जरूरत है तो खोखली और अव्यवहारिक विचारधारा को छोड़कर ‘नई शुरुआत’ करने की। उन्होंने बताया कि सरेंडर करने वाले तीनों नक्सली बस्तर संभाग के हैं। उनका दावा है कि जिले में नक्सलियों के लोकल मेंबर्स का अब पूरी तरह सफाया हो चुका है।