
गाजियाबाद। नगर निकाय चुनाव की तिथि घोषित होते ही सियासी दलों ने चुनावी दंगल में अपने पहलवानों को उतारने की तैयारी शुरू कर दी है। सपा अपनी मेयर उम्मीदवाराें की अपनी पहली लिस्ट जारी कर चुकी है जबकि अन्य पार्टियां भी इसकी तैयारी में हैं। एक-दो दिन में सभी की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। अभी तक भाजपा व कांग्रेस ही केवल निगम चुनाव में प्रत्याशियों को पार्टी सिंबल पर चुनाव लड़ाती थीं, लेकिन इस बार सपा और बसपा ने भी निकाय चुनाव पार्टी सिंबल पर लड़ाने का फैसला किया है। इससे इस बार चुनाव दिलचस्प ही नहीं कांटे का होगा।
30 से अधिक दावेदार
वहीं, बीजेपी के महानगर अध्यक्ष अजय शर्मा का कहना है कि चुनाव को लेकर भाजपाइयों में खासा क्रेज है। संभवत: चार नवंबर तक प्रत्याशियों की घोषणा हो सकती है। प्रदेश नेतृत्व इस पर फैसला देगा। बताया जा रहा है कि भाजपा में मेयर पद के लिए आशा शर्मा, पूर्व विधायक प्रशांत चौधरी की पत्नी हेमलता चौधरी, डॉ. उदिता त्यागी, डॉ. मधु पोद्दार, सुषमा सिंह, उर्मिला मुद्गल, रश्ति गुप्ता, रेनू गुप्ता, सुनीता नागपाल, अंजना त्यागी समेत 30 से अधिक दावेदार हैं। दरअसल, गाजियाबाद का नगर निगम जब से बना है, तबसे अब तक शहरी सरकार यानि निगम पर भाजपा का राज रहा है। मौजूद समय में भाजपा की उत्तर प्रदेश व केद्र में सरकार है। इस लिहाज से निगम में भाजपा हर हालत में जीत दर्ज करना चाहती है और इसके लिए दो महीने से कार्यकर्ता तैयारी में जुटे हैं।
सिंबल पर चुनाव से बदलेंगे समीकरण
भाजपा भले ही यह मानकर चल रही हो भी उसका ही दबदबा रहेगा, लेकिन इस बार माहौल बदला-बदला सा है। पार्टी सिंबल पर हो रहा चुनाव कुछ भी बदल सकता है। सपा पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर रही थी, तब सपा का समर्थन था सिंबल नहीं। ऐसा ही बसपा का हाल था। इसके अलावा भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं जनता की परेशानियां।
विरोधियों का कहना
उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश महासचिव बिजेंद्र यादव के मुताबिक, जनता ने जिस उम्मीद से भाजपा को केद्र व प्रदेश में पूर्व बहुमत की सरकार दिलाई। वो उस पर खरा नहीं उतर पाई है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, महिला के सम्मान में भाजपा मैदान में नारा देने वाले भाजपाई अब शांत हैं। इस चुनाव में लोगों की नाराजगी से भाजपा रूबरू हो जाएगी।
गरीब को नहीं मिलता न्याय
बसपा जिलाध्यक्ष प्रेमचंद भारती के मुताबिक, भाजपा सरकार बढ़ते अपराधों पर काबू करने में नाकामयाब होती दिखाई दे रही है। दलित व मुस्लिम तब भी पिसता था, अब भी परेशान है।