गाजीपुर

भाजपा, सपा, कांग्रेस और सहयोगी दलों ने तेज किया सामाजिक समीकरणों का गणित

Om Prakash Rajbhar Attack on Akhilesh Yadav: सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर ने एक बार फिर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कुर्मी समाज को लेकर कई सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर जारी बयान में राजभर ने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव कुर्मी समाज के मुद्दों की अनदेखी करते हैं। उनसे सार्वजनिक रूप से जवाब देने की मांग की।
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Jul 30, 2026
Omprakash Rajbhar Akhilesh Yadav
अखिलेश यादव और ओमप्रकाश राजभर

UP Elections 2027: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारी में राजनीतिक दलों ने जातियों को बांधने के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है। चुनाव में करीब आठ माह का समय शेष है लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी जमीन मजबूत करने की तैयारी तेज कर दी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही सामाजिक समीकरणों को साधने में जुटे हैं। खासकर पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के वोट बैंक को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है। इसी बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद प्रदेश की राजनीति में एक नया विमर्श उभरकर सामने आया है, जिसने ओबीसी राजनीति को नई बहस के केंद्र में ला दिया है।

प्रदेश सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया कि यदि प्रधान कुर्मी समाज के बजाय यादव समाज से होते, तब भी क्या समाजवादी पार्टी उनके इस्तीफे की मांग करती? राजभर के इस बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में 'कुर्मी बनाम यादव' की बहस छिड़ती नजर आ रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस केवल एक बयान तक सीमित नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़े वर्ग के विभिन्न समुदायों तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने और सामाजिक ध्रुवीकरण की नई रेखाएं खींचने की कोशिश के रूप में भी इसे देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश में यादव और कुर्मी, दोनों ही प्रभावशाली पिछड़ी जातियां हैं और अनेक विधानसभा क्षेत्रों में इनकी निर्णायक भूमिका रहती है।

आम चुनाव के नतीजों के बाद बदली रणनीति

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों को लेकर नए आकलन शुरू हुए हैं। समाजवादी पार्टी ने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) रणनीति के जरिए कई गैर-यादव पिछड़े समुदायों में भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास किया, जिसका असर चुनावी परिणामों में भी दिखाई दिया। कुर्मी समाज से कई उम्मीदवार समाजवादी पार्टी के टिकट पर संसद पहुंचे। ऐसे में माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और सपा, दोनों ही इस सामाजिक आधार को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए नई रणनीति पर काम कर रहे हैं।

भाजपा की चुनौती: गैर-यादव ओबीसी आधार को बनाए रखना

2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को गैर-यादव पिछड़े वर्ग का व्यापक समर्थन मिला था। यही सामाजिक आधार उसकी चुनावी सफलता का महत्वपूर्ण कारण बना। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी अब इस वर्ग में अपनी पकड़ और मजबूत करने की कोशिश कर रही है। सामाजिक सम्मेलन, जातिवार संवाद, लाभार्थी योजनाओं के प्रचार और स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने जैसे प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।

सपा का फोकस: यादव से आगे ओबीसी विस्तार

समाजवादी पार्टी अब केवल अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी नेतृत्व लगातार यह संदेश देने का प्रयास कर रहा है कि वह सभी पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व करती है। 'पीडीए' अभियान भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा और उसके सहयोगी दल सपा को यादव-केंद्रित राजनीति तक सीमित दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि सपा अपनी सामाजिक स्वीकार्यता का दायरा बढ़ाने में लगी है।

सुभासपा और छोटे दलों की भी सक्रियता बढ़ी

पूर्वांचल की राजनीति में सुभासपा, निषाद पार्टी, अपना दल (एस) और अन्य क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटे हैं। ओमप्रकाश राजभर लगातार अति पिछड़े वर्गों के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। माना जा रहा है कि आगामी चुनाव में छोटे दलों की भूमिका कई सीटों पर निर्णायक हो सकती है।

कांग्रेस युवाओं और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर सक्रिय

कांग्रेस पेपर लीक, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय और आरक्षण जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों को लेकर हुए छात्र आंदोलनों में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने खुलकर समर्थन दिया था। पार्टी का प्रयास इन मुद्दों को युवा मतदाताओं से जोड़ने का है।

पेपर लीक से शुरू हुई बहस, जातीय राजनीति तक पहुंची

धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की पृष्ठभूमि में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और छात्रों के आंदोलन का मुद्दा भी जुड़ा रहा है। विपक्ष इसे जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था का प्रश्न बता रहा है, जबकि सत्तापक्ष के कुछ नेताओं के बयानों ने बहस को जातीय प्रतिनिधित्व और सामाजिक राजनीति की दिशा में मोड़ दिया है। इससे प्रदेश की चुनावी राजनीति में नए विमर्श की शुरुआत मानी जा रही है।

चुनावों में किन मुद्दों पर रहेगा मुकाबला

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2027 का विधानसभा चुनाव केवल विकास और कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। सामाजिक प्रतिनिधित्व, ओबीसी राजनीति, जातीय जनगणना, आरक्षण, युवाओं में रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, किसानों के मुद्दे, महिलाओं से जुड़ी योजनाएं और लाभार्थी राजनीति भी चुनावी विमर्श के हिस्से होंगे।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि चुनावी बिगुल भले अभी औपचारिक रूप से न बजा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों ने सामाजिक समीकरणों की बिसात बिछानी शुरू कर दी है। आने वाले महीनों में यह मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों के विश्वास और समर्थन को लेकर भी और अधिक तीखा होने की संभावना है।

Updated on:
30 Jul 2026 03:27 pm
Published on:
30 Jul 2026 03:27 pm
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