चीनी के कटोरा कहे जाने वाले क्षेत्र के चीनी मिलों को बेचने में प्रशासनिक अफसरों ने भी की थी खूब मदद
गोरखपुर। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के शासनकाल में औने-पौने दाम पर बेची गई 21 चीनी मिलों में गोरखपुर क्षेत्र की कई चीनी मिलें भी थी। हाईलेवल पर सेटिंग से की गई इस नीलामी के पहले जिलों के अधिकारियों ने चुपके-चुपके से चीनी मिलों का वैल्यूवेशन कराने के बाद स्कै्रप के रूप में सामानों को ले जाने में मदद तक की थी।
उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड अधीन 21 चीनी मिलों जिसमें 10 चालू व 11 बंद की बिक्री वर्ष 2010-11 में की गई थी। इसमें देवरिया की एक, कुशीनगर की तीन रामकोला-खडडा-लक्ष्मीगंज, महराजगंज की सिसवा की पांच चीनी मिलें बेची गई थी।
इन चीनी मिलों को खरीदने के लिए कई कंपनियों पर गलत तरीके से अपनी बैलेंसशीट तक प्रस्तुत करने का आरोप भी है।
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार शासन के रसूख का इन चीनी मिलों की बिक्री में भरपूर इस्तेमाल किया गया था। आलम यह कि चीनी मिलों को उसकी असली कीमत के दसवें और पंद्रहवें हिस्से की कीमत लगा दी गई थी। आलम यह कि कई चीनी मिलों में मौजूद चीनी और शीरे की कीमत भी चीनी मिलों की आंकी व बेची गई कीमत से अधिक थी। एक जानकार बताते हैं कि चल-अचल संपत्तियों की कीमत जो लगाई गई थी वह सत्ता के रसूख वालों के कहने पर लगी थी।
सीएजी रिपोर्ट के अनुासर चीनी मिलों की भूमि के अलावा संयंत्र, मशीनरी, फैक्ट्री के भवनों, चीनी गोदामों के साथ रिहायशी आवासों और अन्य अचल संपत्तियों के मूल्यांकन में मनमानी की गई। वैल्यवेशन में बिना किसी वजह से 25 प्रतिशत की छूट दे दी गई। एक जानकार बताते हैं कि सर्किल रेट को अनदेखा करने के कारण स्टांप ड्यूटी में कई सौ करोड़ की क्षति पहुंचाई गई।
चालू हालत में थी सिसवा और खड्डा की चीनी मिल
चीनी मिलों को बेचने में मानकों का जमकर उल्लंघन किया गया था। कुशीनगर के खड्डा व महराजगंज की सिसवा चीनी मिल समेत सहारनपुर आदि कई चीनी मिलें जो चल रही थी उनको भी बेच दिया गया। बताया यह जाता है कि बिकने के पूर्व वाले पेराई सत्र में यह चीनी मिलें फायदे में थी।