देवरिया कांड के बाद सरकार का डंडा घूमा तो शुरू हुई जांच
देवरिया आश्रय गृह की सच्चाई सामने आने के बाद अन्य जिलों की भी हकीकत आने लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले के आश्रय ग्रहों का हाल भी कुछ बेहतर नहीं है। कई बाल आश्रय गृह तो किसी यातनाघर की माफिक हैं। न बच्चों को बेहतर रहने-सोने की व्यवस्था है ना ही उनके खाने-पीने की व्यवस्था बढ़िया है तो कागजों में ही कई आश्रय गृह इस वीवीआईपी जिले में संचालित हो रहे हैं।
गोरखपुर जिले में करीब एक दर्जन आश्रय गृह संचालित हो रहे हैं। इनमें कुछ की स्थिति सामान्य है तो कई जगह व्यवस्था के नाम पर केवल कोरमपूर्ती की जा रही है। देवरिया आश्रय गृह कांड के बाद जागी सरकार ने गोरखपुर में भी संचालित ऐसे सेंटर्स की जांच कराई तो नजारा हैरान करने वाला मिला।
शहर के सूरजकुंड के पास स्थित राजकीय सम्प्रेक्षण गृह बालक की स्थिति तो सबसे खराब मिली। 50 बच्चों की क्षमता वाले इस आश्रय गृह में 188 बच्चे कैसे रहते होंगे, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जानवरों की तरह एक 8 गुणे 10 फीट के कमरे में 12 से 13 बच्चों को रखा जाता है। जांच रिपोर्ट के अनुसार यहां वैसे हैं तो 17 कमरे लेकिन ऊपरी मंजिल पर बने कमरे जर्जर हैं, बरसात में पानी टपकता है। मुख्यमंत्री के जिले का यह आश्रय गृह स्वच्छता अभियान को भी मुंह चिढ़ा रहा है। चिकित्सीय सुविधा के नाम पर यहां एक कंपाउंडर की तैनाती है। कर्मचारी यहां ठीक ठाक संख्या में तैनात हैं। 16 कर्मचारी यहाँ तैनात किए गए हैं। सीसीटीवी भी लगे हैं लेकिन मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
गोरखपुर के राजकीय महिला शरणालय की भी हालत कोई जुदा नहीं है। बेहद जर्जर भवन में विभिन्न जिलों की 80 संवासिनियां रहती हैं। कुछ संवासिनियों के बच्चे भी साथ रहते हैं। जर्जर भवन में ये संवासिनियां डर से जीवन व्यतीत कर रही हैं। भोजन से लेकर स्वास्थ्य सब औसत दर्जे का है। हालांकि, यहां सीसीटीवी लगे हैं, होमगार्ड की भी तैनाती है।
ईसाई मिशनरी लिटिल फ्लावर सोसाइटी द्वारा संचालित प्रतीक्षा नामक आश्रय गृह में 38 संवासिनियों के रहने की रिपोर्ट है। अधिकारियों की रिपोर्ट के अनुसार यहां कौशल प्रशिक्षण यथा सिलाई कढ़ाई, कम्प्यूटर प्रशिक्षण की व्यवस्था है। आधा दर्जन संवासिनी संस्था के स्कूलों में पढ़ने जाती हैं। सोने की यहां दिक्कत पाई गई। 38 संवासिनियों के सापेक्ष महज 26 बेड ही यहां हैं। जबकि 6 गर्भवती संवासिनियों के लिए बेहतर चिकित्सीय व्यवस्था भी नहीं उपलब्ध है।
एक जगह परिवार रहता मिला तो दूसरे का वजूद ही नहीं मिला
शहर में ही स्थित अपना घर नामक आश्रय गृह जिसे चिल्ड्रन ऑफ मदर अर्थ सोसाइटी द्वारा संचालित किया जाता हैं में एक भी बच्चा नहीं मिला। एक दम्पति यहां रहता है मिला। इन लोगों ने बताया कि वह यहां के कोऑर्डिनेटर हैं। साफ सफाई बेहद खराब थी। इस संस्था का आफिस भी बंद था। रहने की व्यवस्था बद से बदतर मिली।
प्रोग्रेसिव एजेंसी हुमिनिटी पाथ गीडा में जिस आश्रय गृह के संचालन की बात कही जा रही थी वह कागजों में चलती हुई मिली। मौके पर आश्रय गृह का कोई वजूद नहीं मिला। जबकि यहां नारी निकेतन व बाल आश्रय गृह के संचालन का दावा किया जाता रहा है।
ईसाई मिशनरियों के आश्रय गृह कुछ बेहतर
अधिकारियों की जांच में क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा संचालित आश्रय ग्रहों की व्यवस्था कुछ ठीक-ठाक पाई गई। इन आश्रय गृहों में कइयों ने कौशल प्रशिक्षण की भी व्यवस्था कर रखी है।