मिशन 2019
बीजेपी पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है। लोकसभा चुनाव में 2014 के इतिहास को दोहराने के लिए संगठन से लेकर सरकार तक पूरी ताकत से लगे हुए हैं। योगी के गढ़ में उपचुनाव में बीजेपी को मिली करारी हार के बाद अब संगठन कोई चूक नहीं करना चाह रहा। इस बार पार्टी किसी भी सूरत में यह सीट हासिल करना चाहती है।
पार्टी सूत्रों की मानें तो इस बार भी संगठन ने अपने पूर्व क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल को हरी झंड़ी दे दी है। उपेंद्र दत्त शुक्ल लोकसभा क्षेत्र में सक्रिय भी हो चुके हैं। हालांकि, अंतिम निर्णय अभी होना है जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सलाह भी काफी अहम हो सकता है।
गोरखपुर में कई दौरा कर चुके हैं सुनील बंसल
गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव के बाद प्रदेश के संगठन महामंत्री सुनील बंसल कई दौरे कर चुके हैं। वह सांगठनिक मजबूती के लिए लगातार इस सीट के अलावा आसपास सीटों पर नजरें गड़ाए हुए हैं। माना यह जा रहा है कि लोकसभा उपचुनाव में योगी के गढ़ में हार के बाद बीजेपी इस सीट पर खास रणनीति बना रही है ताकि विपक्षी गठबंधन को मात दिया जा सके।
तीन दशकों से यह सीट मंदिर के पास रही
गोरखपुर लोकसभा सीट गोरखनाथ मंदिर के प्रभाव क्षेत्र वाली सीट मानी जाती है। सन् 1989 से यह सीट लगातार मंदिर के पास रही है। 1989 में इस सीट से गोरखनाथ मंदिर के महंत अवेद्यनाथ विजयश्री हासिल किए थे। 1991 में हुए चुनाव में गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ भाजपा प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में थे। यह चुनाव भी उन्होंने आसानी से जीत ली। 1992 व 1996 में भी महंत अवेद्यनाथ सांसद के रूप में गोरखपुर लोकसभा क्षेत्र से प्रतिनिधित्व किए। लेकिन 1996 में महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति से सन्यास ले लिया। इसके बाद हुए चुनाव में उन्होंने अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारा। 1998 में योगी आदित्यनाथ चुनाव जीतकर 26 साल की उम्र में सांसद बन गए। इसके बाद हुए संसदीय चुनाव का परिणाम योगी आदित्यनाथ के पक्ष में रहा। योगी आदित्यनाथ 1998 के बाद 1999, 2004, 2009 और 2014 का चुनाव लगातार जीतकर पांच चुनाव लगातार जीतने वाले गोरखपुर के पहले सांसद बने।
लेकिन 2017 में यूपी का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने संसदीय सीट छोड़ दी। इस सीट पर हुए उपचुनाव कराया गया। बीजेपी ने तत्कालीन क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल को चुनाव मैदान में उतारा तो समाजवादी पार्टी ने विपक्षी एकता का दांव चलते हुए यहां काफी सक्रिय निषाद पार्टी के अध्यक्ष डाॅ.संजय निषाद के पुत्र प्रवीण निषाद को अपनी सिंबल पर मैदान में उतारा। कांग्रेस को छोड़कर विपक्ष सपा प्रत्याशी के पक्ष में खड़ा रहा। परिणाम अप्रत्याशित आया और योगी के गढ़ में बीजेपी चुनाव हार गई।