गोरखपुर

मछली जैसी पपड़ीदार हो गई लड़कियों की त्वचा, 250 लोगों में से किसी एक को होती है ये बीमारी, जानें बचाव के उपाय

Two Cases Of Rare Disease: दो लड़कियों की त्वचा मछली जैसी पपड़ीदार हो गई। ये बीमारी औसतन 250 लोगों में से किसी एक को होती है। जानिए इस बीमारी से बचाव के उपाय।

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May 05, 2026
दुर्लभ बीमारी के दो केस आए सामने। फोटो सोर्स-पत्रिका न्यूज

Two Cases Of Rare Disease: उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के जिला अस्पताल से एक चौंकाने वाली स्वास्थ्य संबंधी जानकारी सामने आई है। जहां चर्म रोग विभाग में दो युवतियों में एक दुर्लभ त्वचा रोग “इचथियोसिस वल्गारिस” (Ichthyosis Vulgaris) की पुष्टि हुई है। यह बीमारी सामान्य नहीं है और औसतन 250 लोगों में से किसी एक व्यक्ति में पाई जाती है। इस रोग में त्वचा पर मछली के छिलकों जैसी पपड़ी बन जाती है, इसी कारण इसे आम भाषा में “फिश स्केल डिजीज” भी कहा जाता है।

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क्या है इचथियोसिस वल्गारिस?

इचथियोसिस वल्गारिस (Ichthyosis Vulgaris) एक आनुवंशिक त्वचा रोग है, जिसमें त्वचा सूखी, खुरदरी और पपड़ीदार हो जाती है। मरीज की त्वचा पर मोटी परत जमने लगती है, जो देखने में मछली के छिलकों जैसी प्रतीत होती है। यह स्थिति शरीर के कई हिस्सों में हो सकती है, लेकिन खासतौर पर कोहनियों, घुटनों और पैरों के निचले हिस्से पर इसका असर अधिक दिखाई देता है।

जांच में क्या सामने आया

जिला अस्पताल के चर्म रोग विशेषज्ञ डॉ. नवीन वर्मा के अनुसार, दोनों मरीजों की जांच में यह पाया गया कि उनकी त्वचा पर गहरे भूरे रंग की पपड़ी जमी हुई है। खासकर कोहनियों और पैरों के निचले हिस्सों में यह समस्या अधिक गंभीर रूप में दिखाई दी। डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि यह कोई संक्रामक रोग नहीं है, यानी यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता नहीं है।

संक्रमण नहीं, बल्कि आनुवंशिक बीमारी

डॉ. नवीन वर्मा ने बताया कि इचथियोसिस वल्गारिस पूरी तरह से वंशानुगत बीमारी है। यह माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से आती है। इसलिए इसे छूने, साथ रहने या संपर्क में आने से फैलने का कोई खतरा नहीं होता। इस जानकारी से समाज में फैली गलत धारणाओं को दूर करना जरूरी है।

लक्षण और परेशानियां

इस बीमारी के कारण त्वचा में गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे तेज दर्द, जलन और कभी-कभी खून भी निकल सकता है। मरीज को लगातार खुजली की समस्या रहती है। पसीने की ग्रंथियां ठीक से काम नहीं करतीं, जिससे मरीज को गर्मी और उमस सहन करने में दिक्कत होती है। यह स्थिति न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी काफी कष्टदायक होती है।

समाज में भेदभाव की समस्या

डॉ. वर्मा ने यह भी बताया कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों को समाज में कई बार भेदभाव का सामना करना पड़ता है। त्वचा की असामान्य बनावट के कारण लोग दूरी बनाने लगते हैं, जिससे मरीज मानसिक तनाव और हीनभावना का शिकार हो सकते हैं।

इलाज और देखभाल के तरीके

हालांकि इस बीमारी का स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन सही देखभाल से इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। डॉ. वर्मा के अनुसार, सेरामाइड्स युक्त गाढ़े मॉइस्चराइजर का नियमित उपयोग करना चाहिए, जिससे त्वचा नरम बनी रहे और पपड़ी धीरे-धीरे हट सके। नहाने के लिए कठोर साबुन की बजाय सौम्य क्लींजर और गुनगुने पानी का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे त्वचा को अतिरिक्त नुकसान से बचाया जा सकता है।

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