गोरखपुर

मंत्रीजी, अगस्त का महीना फिर आ गया है, मां-बाप अपने बच्चों को लेकर ख़ौफ़ज़दा हैं

सीधे कंपनी से खरीदी जा रही 19.39 रुपये प्र्र्रति लीटर जबकि कंंपनी से आक्सीजन लेकर सप्लार्इ देने वाले पुष्पा सेल्स महज साढ़ेे सोलह रुपय लीटर में कंपनी से लेकर बीआरडी को सप्लार्इ देती

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फिर अगस्त आ चुका है। माँ-बाप अपने बच्चों को लेकर फिर सशंकित हैं। चेहरे पर एक अनजान खौफ का भाव बीआरडी मेडिकल आने वाले हर मां-बाप के चेहरे पर साफ तौर पर देखी जा सकती है। हो भी क्यों न, इस बार भी मुई यह 'नौकी बीमारी' पांच दर्जन से अधिक मासूमों को लील जो चुकी है। यह तब जब इन्सेफेलाइटिस का महीना अभी शुरू जो होने वाला है। यह बात दीगर है कि मासूमों की मौत के रोकथाम का एक कारगर तरीका सरकारी तंत्र ने अपना लिया है कि इन्सेफेलाइटिस से जुड़ी मौतों या इस तरह का कोई आंकड़ा अब बाहर नहीं आएगा। शासन स्तर पर रिपोर्ट भी अगर दी जाएगी तो उसे बंद लिफाफा में ही भेजा जा रहा ताकि सच से लोग वाकिफ न हो सके।
पूर्वान्चल में इन्सेफेलाइटिस पिछले कई दशकों से कहर बरपा रहा। आलम यह है कि अब गर्मी-सर्दी-बरसात की तरह यहां इन्सेफेलाइटिस का भी महीना आता है। हालांकि, इसका कोई इंतजार नहीं करता बल्कि यह बिन बुलाया कहर है जो हर रोज भारत के न जाने कितने भविष्य को लील रहा। केवल बीआरडी मेडिकल कॉलेज व अन्य आंकड़ों पर ही गौर करें तो पिछले कुछ दशकों में पचास हजार से अधिक मासूम इस बीमारी की वजह से मौत के मुंह में जा चुके हैं।
अभी बीते साल अगस्त की ही बात है। जब ऑक्सीजन की कमी ने तीन दर्जन से अधिक बच्चों की जान इसी बीआरडी मेडिकल कॉलेज में हुई थी। इनमें अधिकतर इन्सेफेलाइटिस के मरीज थे। पूरा देश दहल उठा तो सरकार को जुम्बिश हुई और मेडिकल सुविधा बेहतर करने के तमाम दावे होने लगे। यह बात दीगर है कि कागजों में भले ही करोड़ों खर्च हो गए हो, मेडिकल कॉलेज से लेकर गोरखपुर क्षेत्र के जिलों में मेडिकल टीम पूरी तरह से तैयार होने का दावा किया जाता हो लेकिन हकीकत इसके उलट है।
इन्सेफेलाइटिस का सीजन शुरू है लेकिन स्वास्थ्य सुविधाओं में कोई खास इजाफा नहीं दिख रहा। स्वास्थ्य महकमें के लोग बताते हैं कि गोरखपुर जिले में बाल रोग विशेषज्ञों की बेहद कमी है। जितनी आवश्यकता है उसकी चौथाई संख्या भी तैनाती नहीं। इन्सेफेलाइटिस से निपटने के लिए प्राथमिक/सामुदायिक केंद्रों को भी अत्याधुनिक सुविधाओ से लैस किया जाना था। आईसीयू बनाया जाना था लेकिन अधिकतर जगहों पर संसाधन का ही अभी इंतजाम नहीं हो पाया है। यहाँ न वेंटीलेटर खरीदे गए हैं न अन्य जरूरी उपकरण। यह उन सेंटर्स की बात है जहाँ विशेष तौर पर इन्सेफेलाइटिस से निपटने की तैयारी है। अन्य केंद्रों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।
खैर, इस साल अकेले बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अभी तक 200 से अधिक बच्चे और सौ के करीब वयस्क इन्सेफेलाइटिस के इलाज को आये। इनमें 70 से अधिक बच्चे मौत के मुंह में समा गए तो डेढ़ दर्जन के करीब वयस्कों की जान जा चुकी है।
इन जिलों के लिए कहर है
गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल काॅलेज में गोरखपुर, देवरिया, बस्ती, महाराजगंज, कुशीनगर, सिद्घार्थनगर, संत कबीरनगर, बहराइच, लखीमपुर खीरी और गोंडा आदि जिलों से लोग इलाज के लिए आते हैं। इंसेफेलाइटिस इन क्षेत्रों में कहर बनी हुई है।

मंत्रीजी ने कहा था अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं
सरकार के वरिष्ठ मंत्री/ प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने बीते साल अगस्त में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों पर बयान देते हुए यह कहा था कि अगस्त में तो मौतें होती रहती है। 2017 के अगस्त महीना में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की हुई मौतों पर सरकारी लापरवाही को ढकने की कोशिश में प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने कई सालों के मौतों का आंकड़ा पेश किया था। आंकड़ों को दिखाते हुए उन्होंने कहा था कि अगस्त महीना में तो बच्चे मरते ही हैं। लेकिन अगस्त क्या साल का हर महीना माताओं की कोख उजाड़ रहा, पर सरकार से लेकर हर कोई चुप्पी साधे हुए है।

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Published on:
03 Aug 2018 09:09 am
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