
वीरेंद्र जोशी
Guna news: बेटी की विदाई हर घर का सबसे भावुक पल होता है लेकिन एमपी में गुना जिले के 13 गांव ऐसे हैं, जहां वर्षों तक यह पल घर की चौखट पर नहीं आया। शहनाइयां बजीं, फेरे हुए, बारातें आईं, लेकिन बेटियां अपने ही आंगन से विदा नहीं हो सकीं। वजह कोई सामाजिक विवाद नहीं, बल्कि गांव की एक ऐसी परंपरा है जो गोवंश की मृत्यु के बाद पूरे गांव ने मिलकर निभाई। किसी के लिए यह आस्था का प्रतीक बनी, तो किसी परिवार के लिए जीवनभर का दर्द।
दरअसल, आरोन और राघौगढ़ ब्लॉक के कई गांवों में आज भी बुजुर्गों का सामूहिक निर्णय पूरे समाज की परंपरा माना जाता है। वर्षों पहले गांव में हुई गोवंश की मौत के बाद चौपाल में यह तय किया गया कि जब तक उस परिवार की बेटी की विदाई नहीं होगी, तब तक गांव में किसी भी घर से विवाह संस्कार नहीं होंगे। इसके बाद शादियां तो होती रहीं, लेकिन गांव की सीमा के बाहर।
भैंसावला गांव के 70 वर्षीय तोरण सिंह यादव बताते हैं कि वर्ष 2011 में एक दलित परिवार के यहां दुर्घटना हुई। चार पहिया वाहन की टक्कर से एक गाय घायल हुई और कुछ दिनों बाद उसकी मौत हो गई। ग्रामीणों ने गोवंश का पूरे विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया। इसके बाद चौपाल बुलाई गई। गांव के बुजुर्गों ने इसे अशुभ मानते हुए निर्णय लिया कि जब तक संबंधित परिवार की बेटी की विदाई नहीं होगी, तब तक गांव में कोई भी विवाह समारोह नहीं होगा। समय बीतता गया, लेकिन बीच-बीच में अलग-अलग हादसों में गोवंश की मौत होती रही। हर बार परंपरा फिर आगे बढ़ती गई। देखते ही देखते यह सिलसिला करीब 15 वर्षों तक चलता रहा।
ढिमरयाई गांव के 68 वर्षीय रामवीरसिंह बताते हैं कि गांव में पहले गोवंश की दुर्घटनावश मौत हुई। कुछ समय बाद एक ट्रैक्टर हादसे में एक बच्चे की भी जान चली गई। इन घटनाओं के बाद लोगों का विश्वास और गहरा हो गया। नतीजा यह रहा कि गांव के बेटे-बेटियों की शादियां होती रहीं, लेकिन गांव की सीमा के बाहर।
ग्राम भैसावला के तोरण सिंह यादव के नाती गोविंद सिंह की शादी ककरुआ गांव की रवीना यादव से बीती 21 अप्रेल 2026 को उक्त परंपरा की वजह से गांव की सीमा के बाहर टेंट लगाकर धूमधाम से कराई गई है, क्योंकि दूल्हा- दुल्हन दोनों के गांव में गो हत्या के कारण बुजुर्गों की परंपरा का आज भी पालन किया जा रहा है।
चौपेट गांव के भगवान सिंह गुर्जर उस दिन को आज भी नहीं भूल पाए। पांच वर्ष पहले उनकी बहन की शादी तय हुई। तारीख भी निश्चित थी, लेकिन गांव की परंपरा रास्ते में खड़ी थी। वे बताते हैं कि घर में विवाह करना संभव नहीं था। रिश्तेदारों के ठहरने, बारात के जनमासे और भोजन की व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती बन गई। तब पूरे गांव ने साथ दिया। गांव की सीमा के बाहर बने एक नए मकान और पास के खाली खेत में मंडप सजाया गया। शादी पूरे रीति-रिवाज से हुई, लेकिन बहन अपने घर के आंगन से विदा नहीं हो सकी। यही कसक आज भी परिवार के मन में बनी हुई है।
आरोन और राघौगढ़ ब्लॉक के भैंसावला, ढिमरयाई, शहरोक, कुसमांद, किरर्या, चौपेट, सालय, ककरुआ, रामगिर्द, वृंदावन, इकोदिया, भादौर और मूडरा माता सहित 13 गांव इस अनूठी परंपरा से जुड़े हैं। समय बदला, गांव बदले और जीवन भी आगे बढ़ा, लेकिन इन गांवों की यह परंपरा आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है। यहां बेटियों की विदाई केवल एक रस्म नहीं रही, बल्कि आस्था, सामूहिक विश्वास और भावनाओं के बीच संतुलन बनाने की ऐसी कहानी बन गई, जिसने कई परिवारों की खुशियों में एक अनकही कसक भी जोड़ दी।