
Banana Plants Diwali: दिवाली के त्योहार के साथ ही असम के बाजारों में केले के पौधों, बांस की लकड़ियों, दीयों और पटाखों की मांग बढ़ गई है। राज्य में दिवाली मनाने की एक खास पारंपरिक प्रथा के चलते केले के पौधे और बांस की लकड़ियां लोगों के लिए त्योहार की तैयारियों का अहम हिस्सा बनी हुई हैं। इससे केले के किसानों और बांस कारोबारियों को भी अच्छी कमाई की उम्मीद है।
असम में सदियों पुरानी परंपरा के तहत लोग दिवाली के दौरान घर के बाहर केले के पौधों पर मिट्टी के दीये रखते हैं। इसके साथ ही घर के मुख्य द्वार पर बांस की लकड़ियां भी लगाई जाती हैं। राज्य के कई हिस्सों में आज भी इस परंपरा का पूरी श्रद्धा के साथ पालन किया जाता है। दिवाली से पहले गुवाहाटी के बाजारों में लोगों की भीड़ बढ़ गई है। लोग केले के पौधों, बांस की लकड़ियों, दीयों और पटाखों की खरीदारी कर रहे हैं। बाजारों में पहुंचने वाले केले के पौधे कामरूप, नलबाड़ी और मोरीगांव जैसे जिलों से लाए जा रहे हैं।
गुवाहाटी के गणेशगुड़ी इलाके के रहने वाले हेमेन बरुआ ने बताया कि उन्होंने 300 रुपये में केले के दो पौधे खरीदे हैं। उन्होंने कहा कि पहले लोग आसपास के पहाड़ी इलाकों से केले के पौधे खुद ले आते थे, लेकिन अब वहां केले के पौधे कम होने के कारण व्यापारी दूसरे जिलों से इन्हें शहर में लेकर आते हैं। हेमेन बरुआ ने बताया कि अब नलबाड़ी, बरपेटा और पाठशाला इलाके से केले के पौधे बाजारों में पहुंचाए जा रहे हैं।
केले के पौधे बेचने वाले व्यापारी चाणक्य डेका ने बताया कि वह कामरूप से केले के पौधे लेकर आए हैं। उनके मुताबिक, अब तक वह करीब 5 से 6 हजार रुपये के केले के पौधे बेच चुके हैं। उन्होंने बताया कि वह दिवाली से एक रात पहले ही बाजार में केले के पौधे लेकर पहुंचे थे और त्योहार के चलते ग्राहकों की अच्छी मांग देखने को मिल रही है।
गुवाहाटी की रहने वाली अद्रिता ने बताया कि वह घर पर दिवाली मनाने की तैयारी कर रही हैं। उन्होंने रंगोली के लिए रंग और दीये खरीद लिए हैं और अब पटाखे भी खरीदने की योजना है। वहीं, एक अन्य स्थानीय निवासी सूरज ने बताया कि उन्होंने दिवाली के लिए फूल और पटाखे खरीदे हैं। वह केले का पौधा भी खरीदना चाहते हैं, लेकिन त्योहार के दौरान इसकी कीमत उन्हें कुछ ज्यादा लग रही है।
दिवाली के मौके पर केले के पौधों और बांस की बढ़ती मांग से असम के स्थानीय किसानों और व्यापारियों को फायदा हो रहा है। पारंपरिक रीति-रिवाजों के कारण इन चीजों की मांग हर साल त्योहार के समय बढ़ जाती है। असम के अन्य हिस्सों में भी लोग दिवाली की तैयारियों में जुटे हुए हैं।