ग्वालियर

30 साल हाईकोर्ट में चला ‘आंगन विवाद’ का केस, ग्वालियर में वसीयत की जमीन पर बना कमरा वैध

Courtyard Dispute: 30 साल पुराने आंगन विवाद पर हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन को प्रतिवादी की निजी संपत्ति माना है।
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High Court decision: हाइकोर्ट ने माना निजी संपत्ति (Photo Source - freepik)
High Court decision: हाइकोर्ट ने माना निजी संपत्ति (Photo Source - freepik)

High Court decision: एमपी में ग्वालियर के कम्पू क्षेत्र स्थित महाडिक की गोठ में करीब 30 वर्षों से चले आ रहे आंगन विवाद का पटाक्षेप करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विवादित आंगन सार्वजनिक या सरकारी भूमि नहीं, बल्कि प्रतिवादी की निजी संपत्ति है। अदालत ने वसीयत के आधार पर किए गए निर्माण को वैध माना और हवा-रोशनी बाधित होने के दावों को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस आशीष श्रोती की एकलपीठ ने सिविल जज और जिला अदालत के फैसलों को बरकरार रखते हुए वादी की द्वितीय अपील खारिज कर दी।

मामले के अनुसार नारायण सिंह ने वर्ष 1997 में सिविल जज वर्ग-दो, ग्वालियर की अदालत में दीवानी वाद दायर किया था। उनका दावा था कि पड़ोसी बाबूलाल कुशवाह के मकानों के बीच स्थित आंगन और चौक पंचायती भूमि है। प्रतिवादी इस स्थान पर अवैध निर्माण कर रहे हैं, जिससे उनके मकान के पिछले हिस्से में करीब 200 वर्षों से बने दरवाजों और खिड़कियों से आने वाली हवा और रोशनी बाधित हो रही है।

पुराने दस्तावेजों को भी नहीं मिली मान्यता

वादी ने जिला अदालत में वर्ष 1929 और 1934 के कुछ पुराने नक्शे एवं दस्तावेज साक्ष्य के रूप में पेश करने की अनुमति मांगी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं। किया गया कि ये दस्तावेज ट्रायल कोर्ट में पहले क्यों प्रस्तुत नहीं किए गए। साथ ही अदालत ने माना कि इन दस्तावेजों से भी यह सिद्ध नहीं होता कि विवादित आंगन सरकारी या सार्वजनिक भूमि थी।

वसीयत और अनुमति के आधार पर रखा पक्ष

प्रतिवादी बाबूलाल ने अदालत को बताया कि विवादित आंगन उन्हें राधाबाई की वसीयत के माध्यम से मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि नगर निगम से विधिवत अनुमति लेकर ही निर्माण कराया गया है, इसलिए इसे अवैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वादी उस मकान पर अपना मालिकाना हक साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी साक्ष्य पेश नहीं कर सके, जिसमें वे निवास कर रहे हैं। दूसरी ओर प्रतिवादी ने राधाबाई की वसीयत प्रस्तुत की, जिसे वादी ने भी विवादित नहीं किया।

ग्वालियर हाइकोर्ट की टिप्पणी

ग्वालियर हाईकोर्ट की सिंगल बैच ने एक फैसले में मृतका के मायके पक्ष द्वारा ससुराल पक्ष के तीन अन्य सदस्यों को अतिरिक्त आरोपी के रूप में शामिल करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत किसी को अतिरिक्त आरोपी बनाने की शक्ति एक असाधारण और विवेकाधीन शक्ति है, जिसका उपयोग बेहद सतर्कता और पुख्ता सबूत होने पर ही किया जाना चाहिए। केवल गवाहों के बयानों में नाम आ जाने मात्र से किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता है। जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की बैच ने याचिकाकर्ता शब्बीर खान द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई करते हुए पारित किया।

Updated on:
10 Jul 2026 03:46 pm
Published on:
10 Jul 2026 03:43 pm