
Health Insurance Claim: बीमारी गंभीर नहीं थी और अस्पताल से साठगांठ कर दस्तावेज तैयार कराए गए, यह आधार बनाकर बीमा क्लेम खारिज करना टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी को भारी पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोषण आयोग, ग्वालियर ने बीमा कंपनी के रुख को सेवा में गंभीर कमी करार दिया है।
आयोग ने आदेश में स्पष्ट किया कि इलाज की पद्धति क्या होगी और मरीज को अस्पताल में भर्ती रखने की आवश्यकता है या नहीं, यह उपचार करने वाले चिकित्सक के विवेक का विषय है, बीमा कंपनी का नहीं। आयोग के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शर्मा एवं सदस्य रेवती रमण मिश्रा की पीठ ने बीमा कंपनी द्वारा क्लेम निरस्त करने के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही कंपनी को आदेश दिया कि वह पॉलिसी की शेष क्लेम राशि 15,721 के साथ मानसिक क्षतिपूर्ति के 2,000 और वाद व्यय के 1,000, कुल 18,721 परिवादी को 45 दिन के भीतर अदा करे। तय समयावधि में भुगतान न करने पर कंपनी को 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज भी चुकाना होगा।
कुंज विहार कॉलोनी, गोले का मंदिर निवासी सोनाक्षी सिकरवार के पिता बसंत सिंह सिकरवार ने टाटा एआईजी से 1 लाख रुपए की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रखी थी। सितंबर 2024 में बुखार, ठंड, सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ के चलते सोनाक्षी को चिकित्सक के परामर्श पर हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। 4 दिन चले इलाज में 66,000 खर्च हुए। जब इस खर्च की प्रतिपूर्ति के लिए बीमा कंपनी के समक्ष दावा पेश किया गया, तो कंपनी ने जांच एजेंसी (ओरेकल इन्वेस्टिगेशन) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए इसे बेईमानीपूर्ण व कूट रचित बताते हुए क्लेम खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने दलील दी कि मरीज को कोई गंभीर (क्रिटिकल) बीमारी नहीं थी और अनुचित क्लेम पाने के लिए अस्पताल से मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार कराए गए थे। इस पर आयोग ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि बीमा कंपनी अस्पताल और परिवादी के बीच किसी भी प्रकार की दुरभिसंधि (सांठगांठ) को ठोस दस्तावेजी साक्ष्यों से साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही है।