
Gwalior Pregnancy after sterilization: मध्य प्रदेश की ग्वालियर हाईकोर्ट (Gwalior High Court) की डिवीजन बेंच ने नसबंदी ऑपरेशन के बाद बच्चे के जन्म पर मुआवजे की मांग करने वाली महिला की प्रथम अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड और जांच से स्पष्ट है कि महिला नसबंदी ऑपरेशन से पहले ही गर्भवती हो चुकी थी। ऐसे में डॉक्टरों को लापरवाही का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
याचिकाकर्ता लेडी किश्वर के पहले से पांच बच्चे थे। आर्थिक तंगी के चलते उसने 17 मार्च 2004 को जिला अस्पताल, शिवपुरी में नसबंदी (स्टरलाइजेशन) ऑपरेशन कराया था। था। कुछ कुछ समय बाद पेट दर्द होने पर उसकी सोनोग्राफी कराई गई। जांच में वह गर्भवती पाई गई। इसके बाद 25 अक्टूबर 2004 को उसने छठी संतान के रूप में बेटी को जन्म दिया।
महिला ने डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए ट्रायल कोर्ट में 1.5 लाख रुपए मुआवजे का दावा किया था। फास्ट ट्रैक कोर्ट, शिवपुरी ने 20 मार्च 2006 को उसका दावा खारिज कर दिया। इसके खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट में प्रथम अपील दायर की थी।
हाईकोर्ट ने सोनोग्राफी रिपोर्ट और डॉक्टरों के बयानों का परीक्षण किया। रिकॉर्ड के अनुसार 4 जुलाई 2004 को महिला करीब 22 सप्ताह की गर्भवती थी। गर्भावस्था की अवधि की गणना करने पर गर्भधारण की तिथि 17 मार्च 2004 से पहले की निकलती है। यानी नसबंदी ऑपरेशन के दिन ही महिला पहले से गर्भवती थी। कोर्ट ने यह भी पाया कि नसबंदी से पहले महिला के पैथोलॉजिकल टेस्ट कराए गए थे। इन जांचों में शुरुआती गर्भ का पता नहीं चला था। डॉक्टरों ने उपलब्ध जांच रिपोर्ट के आधार पर ही नसबंदी की प्रक्रिया की थी। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि डॉक्टरों ने जानबूझकर गर्भावस्था की स्थिति की अनदेखी की।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नसबंदी के बाद बच्चे का जन्म हो जाना अपने आप में चिकित्सकीय लापरवाही का सीधा प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए ऑपरेशन की प्रक्रिया में गंभीर लापरवाही साबित करना जरूरी है। इस मामले में ऐसी कोई लापरवाही साबित नहीं हुई। हाईकोर्ट ने महिला की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा