
हाईकोर्ट का फैसला, प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- magnific)
Gwalior News: पैतृक संपत्ति, पारिवारिक बंटवारे और जमीन के कानूनी अधिकारों को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक अहम निर्णय सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार का सिद्धांत पूरी तरह समाप्त हो चुका है। ऐसे में कोई भी बेटा अपने पिता के जीवित रहते हुए पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से या अलग बंटवारे की कानूनी मांग नहीं कर सकता। जस्टिस आशीष श्रोती की एकलपीठ ने अशोकनगर निवासी हरीराम की द्वितीय अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को पूरी तरह सही और विधि सम्मत ठहराया है।
अशोकनगर के रहने वाले हरीराम ने अपने जीवित पिता मंगलीया और अपने भाइयों के खिलाफ दीवानी अदालत में मुकदमा दायर किया था। विवादित कृषि भूमि उसके परदादा बलदेवा की थी। बलदेवा की मौत के बाद जमीन उनके तीन बेटों (कम्मोदा, जुगती और सोमा) को मिली। कम्मौदा का बेटा मंगलीया (हरीराम का पिता) है।
हरीराम ने तर्क दिया था कि वह संयुक्त परिवार की सह-दायिकी का सदस्य है और जन्म के आधार पर पैतृक जमीन में उसका कानूनी अधिकार बनता है। उसने अपने पिता के 1/3 हिस्से में से खुद के लिए 1/5वें हिस्से की मांग की थी। इसके साथ ही, पिता मंगलीया द्वारा वर्ष 2008 में बेची गई जमीन की रजिस्ट्री को भी निरस्त करने की गुहार लगाई थी।
जन्मसिद्ध अधिकार का अंतः कोर्ट ने कहा कि 1956 का अधिनियम लागू होने के बाद मिताक्षरा कानून का यह सिद्धांत अब लागू नहीं होता कि बेटा जन्म लेते ही पिता की संपत्ति में हिस्सेदार बन जाएगा।
पिता की संपत्ति संयुक्त परिवार की नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पिता को पूर्वजों से मिली संपत्ति, उनके बेटों के संदर्भ में अपने आप संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति नहीं बन जाती। पिता अपने जीवनकाल में उस संपत्ति का पूर्ण स्वामी है।
उत्तराधिकार केवल मृत्यु के बादः कोर्ट ने दो टूक कहा कि बेटा केवल और केवल पिता की मृत्यु के बाद ही कानूनी उत्तराधिकार नियमों के तहत संपत्ति में हिस्सेदारी पाने का हकदार होता है, पिता के जीवित रहते नहीं।
Updated on:
13 Sept 2026 08:44 am
Published on:
13 Sept 2026 08:19 am
