
पैतृक संपत्ति पर ग्वालियर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला (फोटो-ANI)
High Court Verdict : पैतृक संपत्ति के संबंध में कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है। हाईकोर्ट ने इसे बेटे का 'जन्मसिद्ध अधिकार' मानने से स्पष्ट इंकार दिया है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बैंच ने इस संबंध में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कह दिया है कि पिता के जीवित रहते हुए पुत्र, पैतृक संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मांग सकता। कानूनी रूप से उसे इसका कोई अधिकार नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक हाईकोर्ट के इस फैसले का व्यापक असर हो सकता है।
पैतृक संपत्ति पर संतान का कानूनन कोई अधिकार नहीं
वर्तमान दौर में युवा शादी होते ही प्राय: अपनी पुश्तैनी संपत्ति पर हक जताने लगते हैं। युवक माता पिता से अपना हिस्सा मांगते हुए अलग होने की बात कहते हैं पर कानूनन यह गलत है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने साफ कर दिया है कि पैतृक संपत्ति पर संतान का कानूनन कोई अधिकार नहीं है। पैतृक संपत्ति पर बेटे का 'जन्मसिद्ध अधिकार' जैसा कोई कानूनी आधार ही नहीं है।
ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस संबंध में दाखिल की गई द्वितीय अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के बाद 'जन्मसिद्ध अधिकार' का सिद्धांत खत्म हो चुका है। इसके अंतर्गत पिता के जीवित रहते बेटे को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिल सकेगा।
पैतृक संपत्ति, पारिवारिक बंटवारे और जमीन के कानूनी अधिकारों को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के इस निर्णय को बड़ा और युगांतकारी निर्णय कहा जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होने के बाद संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार का सिद्धांत पूरी तरह समाप्त हो चुका है। ऐसे में कोई भी बेटा अपने पिता के जीवित रहते हुए पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से या अलग बंटवारे की कानूनी मांग नहीं कर सकता। जस्टिस आशीष श्रोती की एकलपीठ ने अशोकनगर निवासी हरीराम की द्वितीय अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को पूरी तरह सही और विधि सम्मत ठहराया है।
ये है मामला
अशोकनगर के रहने वाले हरीराम ने अपने जीवित पिता मंगलीया और अपने भाइयों के खिलाफ दीवानी अदालत में मुकदमा दायर किया था। विवादित कृषि भूमि उसके परदादा बलदेवा की थी। बलदेवा की मौत के बाद जमीन उनके तीन बेटों (कम्मोदा, जुगती और सोमा) को मिली। कम्मोदा का बेटा मंगलीया (हरीराम का पिता) है। हरीराम ने तर्क दिया था कि वह संयुक्त परिवार की सह-दायिकी का सदस्य है और जन्म के आधार पर पैतृक जमीन में उसका कानूनी अधिकार बनता है। उसने अपने पिता के 1/3 हिस्से में से खुद के लिए 1/5वें हिस्से की मांग की थी। इसके साथ ही, पिता मंगलीया द्वारा वर्ष 2008 में बेची गई जमीन की रजिस्ट्री को भी निरस्त करने की गुहार लगाई थी।
1. जन्मसिद्ध अधिकार का अंत: कोर्ट ने कहा कि 1956 का अधिनियम लागू होने के बाद मिताक्षरा कानून का यह सिद्धांत अब लागू नहीं होता कि बेटा जन्म लेते ही पिता की संपत्ति में हिस्सेदार बन जाएगा।
2. पिता की संपत्ति संयुक्त परिवार की नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता को अपने पूर्वज (परदादा/दादा) से मिली संपत्ति, उनके बेटों के संदर्भ में अपने आप संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति नहीं बन जाती। पिता अपने जीवनकाल में उस संपत्ति का पूर्ण स्वामी है।
3. उत्तराधिकार केवल मृत्यु के बाद: कोर्ट ने दो टूक कहा कि बेटा केवल और केवल पिता की मृत्यु के बाद ही कानूनी उत्तराधिकार नियमों के तहत संपत्ति में हिस्सेदारी पाने का हकदार होता है, पिता के जीवित रहते नहीं।
Updated on:
12 Sept 2026 02:03 pm
Published on:
12 Sept 2026 01:04 pm
