MP News: हाइकोर्ट में जस्टिस अमित सेठ की एकल पीठ ने पति और पत्नी की ओर से दायर दो अलग-अलग आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं पर सुनवाई की।
MP News: हाईकोर्ट की एकल पीठ ने भरण-पोषण से जुड़े मामले में व्यवस्था दी है कि आवेदन की तारीख से एकमुश्त भारी राशि का निर्धारण करना उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा, पिछले वर्षों के लिए मेंटेनेंस की गणना उस दौरान रही पति की वास्तविक आय के अनुपात में की जानी चाहिए। जस्टिस अमित सेठ की एकल पीठ ने पति और पत्नी की ओर से दायर दो अलग-अलग आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं पर सुनवाई की।
दरअसल, फैमिली कोर्ट ग्वालियर ने 30 दिसंबर 2024 को आदेश दिया था कि पति अपनी पत्नी को 4 फरवरी 2016 (आवेदन की तिथि) से 20,000 रुपए प्रतिमाह भरण-पोषण दे। पति ने इस 'बैंक डेट' से लागू एकमुश्त राशि को चुनौती दी थी, जबकि पत्नी ने राशि बढ़ाने की मांग की थी।
वर्ष 2016 में जब आवेदन दिया गया था, तब पति का वेतन लगभग 29,711 रुपए था। अदालत में अंतिम सुनवाई के समय पति का वेतन बढ़कर 70,499 रुपए हो चुका था। फैमिली कोर्ट द्वारा तय 20,000 रुपए की राशि वर्तमान वेतन का लगभग 28 फीसदी है, लेकिन 2016 के वेतन के हिसाब से यह 67 फीसदी हो जाती, जो कि अनुचित है।
अनुपातिक गणनाः 4 फरवरी 2016 से 31 मार्च 2024 तक की अवधि के लिए मेंटेनेंस की गणना पति के उस समय के आयकर रिटर्न और वास्तविक वेतन के अनुपात में की जाए।
बीते दिनों हाइकोर्ट ने एक कोविड-19 लॉकडाउन अवधि के दौरान कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) अंशदान जमा करने में हुई देरी को लेकर राहत दी है। जस्टिस जीएस अहलुवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) को निर्देश दिए है कि मार्च 2020 से 31 मार्च 2021 तक की अवधि के लिए लगाए गए दंड और ब्याज की गणना नए सिरे से की जाए। यह आदेश भिंड जिले के मालनपुर स्थित मैसर्स त्रिमूर्ति मेटल इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।
कंपनी ने ईपीएफओ द्वारा जारी वसूली नोटिस को चुनौती देते हुए कहा था कि कोविड महामारी और लॉकडाउन के कारण उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान हुआ, जिससे समय पर ईपीएफ अंशदान जमा नहीं हो सका। इसके बावजूद विभाग ने भारी दंड और ब्याज लगा दिया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि ईपीएफओ ने 15 मई 2020 को जारी अपने ही सर्कुलर की अनदेखी की। सर्कुलर में स्पष्ट कहा गया था कि लॉकडाउन के दौरान अंशदान जमा करने में हुई देरी पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि यह परिस्थितिजन्य मजबूरी थी और इसमें नियोक्ता की कोई गलत मंशा नहीं थी।
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