भारतीय इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, कला, स्थापत्य और दर्शन में निहित ज्ञान परंपराओं ने विश्व को दिशा दी है। आज आवश्यकता है कि हम इन परंपराओं को आधुनिक शोध पद्धतियों से जोड़ते हुए नई पीढ़ी तक पहुंचाएं। पुरातत्व में जो प्रमाण मिलते हैं, उससे भारत की परंपरा और ज्ञान काफी समृद्ध नजर आते हैं। भारतीय ज्ञान […]
भारतीय इतिहास, संस्कृति, विज्ञान, कला, स्थापत्य और दर्शन में निहित ज्ञान परंपराओं ने विश्व को दिशा दी है। आज आवश्यकता है कि हम इन परंपराओं को आधुनिक शोध पद्धतियों से जोड़ते हुए नई पीढ़ी तक पहुंचाएं। पुरातत्व में जो प्रमाण मिलते हैं, उससे भारत की परंपरा और ज्ञान काफी समृद्ध नजर आते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा हमारी सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार है। यह परंपरा केवल अतीत तक सीमित नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को भी दिशा देने में सक्षम है। यह बात उत्तरप्रदेश राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ की निदेशक रेनू द्विवेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला में प्रधानमंत्री उच्चतर शिक्षा अभियान (पीएम ऊषा) द्वारा प्रायोजित भारतीय इतिहास में भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि कही। अध्यक्षता जेयू के प्रभारी कुलगुरु प्रो.जेएन गौतम ने की। विशिष्ट अतिथि डॉ.दिनेश शर्मा, कुलसचिव डॉ.राजीव मिश्रा व आयोजन सचिव डॉ. शांतिदेव सिसोदिया मंचासीन रहे। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. राजीव मिश्रा ने कहा कि भारतीय इतिहास लेखन में भारतीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विकास की आधारशिला रही है। इस संगोष्ठी के माध्यम से शोधार्थियों को अपने विषयों को नए दृष्टिकोण से देखने का अवसर मिला है।
औपनिवेशिक काल में भारतीय ज्ञान को हाशिए पर रखा गया
विशिष्ट अतिथि डॉ.दिनेश शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा बहु विषयक है, जिसमें वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, गणित, खगोलशास्त्र, व्याकरण और राजनीति शास्त्र जैसे विषयों का समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में भारतीय ज्ञान को हाशिये पर रखा गया, लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपने मूल स्रोतों की पुन: व्याख्या करें और उन्हें वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाएं। प्रो.जेएन गौतम ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमारे राष्ट्र की आत्मा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शिक्षा के बीच सेतु का कार्य करें। डॉ.शांतिदेव सिसोदिया ने कहा कि पीएम ऊषा जैसी योजनाएं उच्च शिक्षा संस्थानों को शोध एवं अकादमिक गतिविधियों के लिए नई ऊर्जा प्रदान कर रही हैं।
11 ऑफलाइन तो 18 ऑनलाइन शोधपत्रों का वाचन हुआ
संगोष्ठी के दूसरे दिन 11 ऑफलाइन व 18 ऑनलाइन शोधपत्रों का वाचन किया गया। इसके साथ ही दो दिवसीय संगोष्ठी में कुल 54 रिसर्च पेपर पढ़े गए। कार्यक्रम का संचालन आनंद मिश्रा एवं कुमकुम सिंह ने किया। इस अवसर पर प्रो.हेमन्त शर्मा, प्रो.विवेक बापट, प्रो.एसएन महापात्रा, डॉ.सपन पटेल, सहायक कुलसचिव अमित सिसोदिया सहित शोधार्थी व छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
इन्होंने पढ़े ऑनलाइन व ऑफलाइन पेपर
दूसरे तकनीकी सत्र के चेयरपर्सन सेंट जेवियर्स कॉलेज मुंबई के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ.अवकाश डी.जाधव एवं को चेयरपर्सन वसंतराव नाईक शासकीय इंस्टीट्यूट ऑफ आट्र्स एंड सोशल साइंस नागरपुर के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.आशीष शिंदे थे। इस सत्र में डॉ.मनोज कुमार कुर्मी अधीक्षण पुरातत्वविद भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण, डॉ.यदुनंदन प्रसाद, रूचि श्रीवास्तव, धीरेन्द्र कुमार, खेमराज आर्य, काजल, नेहा सरल, कुमकुम सिंह, पूजा यादव, डॉ.प्रवीण वर्मा, राहुल कुमार व डॉ.मनोरमा सिंह ने अपने शोधपत्रों का वाचन किया।