Indian Railway New system: अब एक ही ट्रैक पर सुरक्षित दूरी बनाकर एक के पीछे दूसरी ट्रेनें आसानी से दौड़ सकेंगी, धुंध में भी फुल कॉन्फिडेंस से दौड़ेंगे लोको पायलट, आउटर पर नहीं रुकेंगी ट्रेनें, यात्रियों का समय बचेगा, जानें कैसे काम करेगा रेलवे का नया ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम
Indian Railway New system: भारतीय रेलवे ने अपनी पारंपरिक कछुआ चाल को अलविदा कहकर डिजिटल और हाईस्पीड युग में कदम रख दिया है। झांसी-हेतमपुर रेलखंड पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम (स्वचालित सिग्नल प्रणाली) के लागू होने से ट्रेनों के संचालन का पूरा गणित ही बदल गया है। लगभग 155 किलोमीटर लंबे इस व्यस्त रूट पर अब ट्रैक के हर एक किलोमीटर पर रेलवे की तीसरी आंख तैनात है। पहले जहां इस दूरी में केवल 34 सिग्नल थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़ाकर 162 कर दी गई है। इस बदलाव से न केवल ट्रेनों की रफ्तार बढ़ेगी, बल्कि यात्रियों को स्टेशन के बाहर (आउटर पर) बेवजह खड़े रहने की झंझट से भी मुक्ति मिल जाएगी।
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एक के पीछे एक दौड़ेंगी ट्रेनें पुरानी व्यवस्था में एक स्टेशन से दूसरी ट्रेन तब तक रवाना नहीं की जाती थी, जब तक कि आगे चल रही ट्रेन अगले स्टेशन तक न पहुंच जाए।
■ अब क्या बदला: नई तकनीक में ट्रैक को छोटे-छोटे ब्लॉक (करीब 1-1 किमी) में बांट दिया गया है।
■ इलेक्ट्रॉनिक नजर: आधुनिक सेंसर्स और इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क के जरिए ट्रेन की लोकेशन बदलते ही सिग्नल का रंग अपने आप बदल जाता है। अब एक ही ट्रैक पर सुरक्षित दूरी बनाकर एक के पीछे दूसरी ट्रेनें आसानी से दौड़ सकेंगी। इससे ट्रैक की क्षमता कई गुना बढ़ गई है।
1. ड्राइवर्स का बढ़ा भरोसा: अब लोको पायलट को काफी पहले ही आगे के सिग्नल की सटीक स्थिति का पता चल जाता है। खराब मौसम या धुंध में भी ड्राइवर पूरे आत्मविश्वास के साथ ट्रेन की रफ्तार बनाए रख सकेंगे।
2. आउटर पर नो वेटिंग: अक्सर अगले स्टेशन से हरी झंडी न मिलने के कारण ट्रेनों को आउटर पर रोक दिया जाता था। अब ऑटोमेटिक ब्लॉक सिस्टम के कारण ट्रेनें एक-दूसरे के पीछे चलती रहेंगी, जिससे स्टेशन मास्टर को भी मैन्युअली सिग्नल ऑपरेट नहीं करना पड़ेगा।
ग्वालियर से गुजरने वाले ट्रैफिक का दबाव इतना ज्यादा है कि यह सिस्टम 'लाइफलाइन' साबित होगा-
■ झांसी-आगरा रूट: 170 ट्रेनें
■ ग्वालियर-गुना रूट: 28 ट्रेनें
■ ग्वालियर-भिंड रूट: 06 ट्रेनें
■ ग्वालियर-कैलारस : 06 ट्रेनें
■ थ्रू (बिना रुके) ट्रेनें: 26 ट्रेनें
■ कुल: 236 ट्रेनें प्रतिदिन
रेलवे ट्रैक के हर किलोमीटर पर ऑटोमेटिक सिग्नलिंग सिस्टम लगाया जा रहा है। इससे ट्रैक की कैपेसिटी और ट्रेनों की स्पीड दोनों बढ़ती है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि ट्रेनों को अब किसी स्टेशन या आउटर पर बेवजह इंतजार नहीं करना पड़ता। झांसी मंडल में यह काम लगभग पूरा हो चुका है।
-शशिकांत त्रिपाठी, सीपीआरओ, उत्तर मध्य रेलवे