Jyotiraditya Scindia- ग्वालियर में जीडीए और साडा में नियुक्तियों से साफ हुई तस्वीर, सत्ता के केंद्र में अब भी सिंधिया
Jyotiraditya Scindia- एमपी में विभिन्न निगमों, मंडलों, विशेष क्षेत्र प्राधिकरणों में नियुक्तियों का दौर लगातार जारी है। इसी क्रम में ग्वालियर विकास प्राधिकरण जीडीए और विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण साडा में भी नियुक्तियां की गई हैं। इन नियुक्तियों के संबंध में प्रदेश के नगरीय विकास विभाग द्वारा रविवार को जारी आदेश के साथ ही ग्वालियर में ज्योतिरादित्य सिंधिया का दबदबा साफ नजर आया। ग्वालियर के विकास की रूपरेखा तय करने वाली दो सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं ग्वालियर विकास प्राधिकरण और विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण में सिंधिया समर्थकों अहम दायित्व दिए गए हैं।
हालिया राजनैतिक नियुक्तियों ने प्रदेश की राजनीति में एक स्पष्ट संदेश दिया है। ग्वालियर चंबल इलाके में सत्ता के केंद्र में अब भी ज्योतिरादित्य सिंधिया ही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि इन पदों के लिए खींचतान लंबी चलेगी, लेकिन अंतिम सूची ने यह साफ कर दिया है कि ग्वालियर के निर्णयों में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बड़ा प्रभाव रहता है।
जीडीए और साडा में जिन नेताओं की नियुक्तियां हुई हैं उन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमे का ही माना जाता है। दरअसल इन दोनों प्राधिकरणों में उन्होंने अपने 5 समर्थकों को अहम पद दिला दिए हैं।
अध्यक्ष पद पर मधुसूदन भदौरिया की नियुक्ति में सिंधिया की रजामंदी, उपाध्यक्ष के रूप में सुधीर गुप्ता व वेद प्रकाश शिवहरे का चयन
ग्वालियर विकास प्राधिकरण (जीडीए) अध्यक्ष पद पर मधुसूदन भदौरिया की नियुक्ति में सिंधिया की रजामंदी और उपाध्यक्ष के रूप में सुधीर गुप्ता व वेद प्रकाश शिवहरे का चयन सीधे तौर पर सिंधिया खेमे की मजबूती को दर्शाता है। ये सभी नेता सिंधिया समर्थक माने जाते हैं।
ग्वालियर के भविष्य के विस्तार के लिए जिम्मेदार इस संस्था की कमान अशोक शर्मा को सौंपी गई है, जबकि हरीश मेवाफरोश को उपाध्यक्ष बनाया गया है। ये दोनों भी सिंधिया के खेमे के ही माने गए हैं।
इन नियुक्तियों के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि ग्वालियर के विकास से संबंधित निर्णयों में ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका और उनका दबदबा न केवल कायम है, बल्कि पहले से कहीं अधिक संगठित व सशक्त होकर उभरा है। जीडीए और साडा के मुख्य पदों पर नियुक्तियों को लेकर जो हालिया विश्लेषण सामने आए हैं, वे इशारा करते हैं कि यह केवल संगठन की मजबूती नहीं, बल्कि सिंधिया के दबदबे का परिणाम है।