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ग्वालियर : एसी कमरों से बाहर निकलें अफसर, कागजों पर नहीं, जमीन पर जाकर देखें आदिवासियों का दर्द

हाईकोर्ट ने श्योपुर, गुना और अशोकनगर जिलों में आदिवासियों के साथ हो रहे शोषण और उन्हें बंधुआ मजदूर बनाए जाने के मामले में राज्य सरकार और उसकी विशेष जांच टीम (एसआइटी) को फटकार लगाई है। कोर्ट ने एसआइटी की स्टेटस रिपोर्ट को केवल एक दिखावा करार दिया और कहा कि अधिकारी सिर्फ एसी कमरों में बैठकर कागजी कार्रवाई कर रहे हैं, जबकि जमीन पर कोई वास्तविक सर्वे नहीं किया गया।

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ग्वालियर. हाईकोर्ट ने श्योपुर, गुना और अशोकनगर जिलों में आदिवासियों के साथ हो रहे शोषण और उन्हें बंधुआ मजदूर बनाए जाने के मामले में राज्य सरकार और उसकी विशेष जांच टीम (एसआइटी) को फटकार लगाई है। कोर्ट ने एसआइटी की स्टेटस रिपोर्ट को केवल एक दिखावा करार दिया और कहा कि अधिकारी सिर्फ एसी कमरों में बैठकर कागजी कार्रवाई कर रहे हैं, जबकि जमीन पर कोई वास्तविक सर्वे नहीं किया गया। अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि आदिवासी समाज इतना साक्षर नहीं है कि वह ऑनलाइन या सीएम हेल्पलाइन पर अपनी शिकायत दर्ज करा सके। अगर प्रशासन इस शोषण को रोकने के लिए गंभीर है, तो अफसरों को खुद जमीन पर उतरकर सच्चाई का पता लगाना होगा। कोर्ट की नाराजगी के बाद अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि अब अफसर एसी कमरों से बाहर निकलेंगे और सीधे ग्राउंड पर जाकर पीड़ित आदिवासियों से मुलाकात कर वास्तविक रिपोर्ट तैयार करेंगे।

ये है पूरा मामला
छोटूलाल आदिवासी ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। शुरुआत में यह एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका थी, लेकिन नवंबर 2025 में कोर्ट ने पाया कि अशोकनगर और आसपास के जिलों में एक बड़ा गठजोड़ काम कर रहा है। यह नेक्सस रसूखदार लोगों के दम पर आदिवासियों की जमीनों को औने-पौने दामों में लिखवा लेता है और बाद में उन्हीं आदिवासियों को अपनी ही जमीन या अन्य जगहों पर बंधुआ मजदूर के रूप में काम करने के लिए मजबूर करता है।

कोर्ट ने उठाए सवाल: एसआइटी की जांच में मिलीं ये बड़ी खामियां
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह बात आई कि कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकार ने पहले तो एसआइटी बनाने में महीनों बर्बाद कर दिए और जब टीम बनी, तो उसने धरातल पर कोई काम नहीं किया। एसआइटी ने उप-पंजीयक कार्यालयों से यह पता लगाने की कोशिश ही नहीं की कि आदिवासियों की जमीनों की कितनी सेल डीड या पावर ऑफ अटॉर्नी रसूखदारों के पक्ष में की गई हैं। कोर्ट ने पाया कि न तो कृषि उपज मंडी से फसल बेचने वाले आदिवासियों के नामों का मिलान किया गया और न ही यह जांचा गया कि फसल का पैसा वास्तव में आदिवासी किसान के बैंक खाते में आया या नहीं।