
Gwalior News :मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर हुई सुनवाई के दौरान अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस अमित सेठ की एकलपीठ में हुई सुनवाई के दौरान उन्होंने रूप से कहा कि, अनुकंपा नियुक्ति किसी कर्मचारी के परिजन को विरासत में मिलने वाला अधिकार नहीं है। ये पूरी तरह सरकार की नीति और निर्धारित पात्रता शर्तों के अधीन है। अदालत ने ये भी कहा कि, अनुकंपा नियुक्ति को उत्तराधिकार कानून के तहत 'कर्ज' या 'प्रतिभूति' (debt or Security) नहीं माना जा सकता है।
हाईकोर्ट की एकल खंडपीठ ने इसी आधार पर ग्वालियर के चतुर्थ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा 23 अप्रैल 2010 को पारित आदेश के उस हिस्से को भी रद्द कर दिया, जिसमें मृतक कर्मचारी की मां और बहन को अनुकंपा नियुक्ति पाने का पात्र माना गया था। बता दें कि, कोर्ट ने ये आदेश करीब 16 साल पहेल दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि, वसीयत, प्रोबेट या उत्तराधिकार संबंधी कार्यवाही के जरिए किसी व्यक्ति को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल सकता। यही नहीं, संबंधित पक्षों के बीच आपसी सहमति या समझौता होने पर भी अदालत ऐसा अधिकार नहीं सौंप सकती।
हाईकोर्ट ने माना कि, अनुकंपा नियुक्ति का मकसद मृत सरकारी कर्मचारी के आश्रित परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से राहत देना है। ये सामान्य भर्ती प्रक्रिया का विकल्प या मृत कर्मचारी की सेवा का हस्तांतरण नहीं है। इसलिए किसी कर्मचारी के निधन के बाद उसके पद या उससे जुड़ी नियुक्ति को संपत्ति की तरह उत्तराधिकारियों के बीच बांटा जाना अनुचित है।
बता दें कि, इस मामले में निचली अदालत ने करीब 16 साल पहले मृतक कर्मचारी की मां और बहन को अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र ठहराया था। हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को कानूनी रूप से उचित नहीं माना और आदेश के संबंधित हिस्से को निरस्त कर दिया। इस फैसले से ये भी साफ हो गया कि, अनुकंपा नियुक्ति पाने के लिए संबंधित व्यक्ति को सरकार की लागू नीति के तहत निर्धारित शर्तों और पात्रता को पूरा करना होगा। सिर्फ वसीयत, प्रोबेट, पारिवारिक समझौते या उत्तराधिकार के जरिए नियुक्ति का दावा नहीं किया जा सकता है।