
ग्वालियर. हाईकोर्ट की डबल बेंच ने नाबालिग के अपहरण और यौन शोषण से जुड़े मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट की फटकार के बाद शिवपुरी एसपी यांगचेन डोलकर भूटिया ने अधीनस्थ अधिकारियों की गंभीर गलती स्वीकार की। इसके बाद खनियांधाना थाना प्रभारी केदार सिंह को निलंबित कर दिया गया, जबकि जांच अधिकारी के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने की बात कही गई। कोर्ट ने नाबालिग को वन स्टॉप सेंटर भेजने के निर्देश दिए।
गर्भवती नहीं तो ब्लड सैंपल क्यों लिया
कोर्ट ने 23 जनवरी 2026 को डीजीपी द्वारा जारी प्रशासनिक आदेश को तत्काल वापस लेने के निर्देश दिए। इस आदेश के तहत दुष्कर्म पीडि़ताओं की स्थिति का आकलन किए बिना रक्त के नमूने लिए जा रहे थे। कोर्ट ने कहा कि जब पीडि़ता गर्भवती ही नहीं है तो डीएनए जांच के लिए ब्लड सैंपल लेने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने इसे वरिष्ठ अधिकारियों की अज्ञानता करार दिया।
मां को सौंपने से किया इनकार
मामला बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा है। नाबालिग की मां ने पुलिस पर आरोपियों से मिलीभगत और उसे इधर-उधर भटकाने का आरोप लगाया। मां जब अपनी बेटी को लेने खनियांधाना थाने पहुंची तो पुलिस ने उसे सुपुर्द करने से इनकार कर दिया और नाबालिग को आरोपी भूरा के पास ही रहने दिया। आरोप है कि पुलिस ने आरोपियों से सुलह के लिए दबाव भी बनाया। कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिस को बालिका को मां के सुपुर्द करना उचित नहीं लग रहा था तो उसे बाल कल्याण समिति के समक्ष पेश किया जाना चाहिए था। नाबालिग को आरोपी के साथ छोडऩा अपहरण और दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध को बढ़ावा देने जैसा है और यह मानव तस्करी की ओर भी इशारा करता है।
पॉक्सो और बीएनएस की धाराओं में कार्रवाई
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट 2012 की धारा 19, 20, 21 और बीएनएस 2023 की धारा 198, 199 का उल्लेख करते हुए एसपी से पूछा कि जांच अधिकारी के खिलाफ इन प्रावधानों के तहत आपराधिक मामला क्यों नहीं दर्ज किया जाना चाहिए। कोर्ट के कड़े रुख के बाद एसपी ने जांच अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार आपराधिक कार्रवाई किए जाने की बात स्वीकार की।