
High Court news: प्रेम विवाह के बाद पुलिस सुरक्षा के लिए दायर की जाने वाली याचिकाओं की बढ़ती प्रवृत्ति पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने स्पष्ट कहा कि पुलिस संरक्षण के लिए रिट याचिका दायर करना शादी का आठवां फेरा नहीं बन जाना चाहिए।
अदालत ने वकीलों को भी नसीहत दी कि वे अपने सम्मानित दफ्तरों का इस्तेमाल विवाह के इच्छुक युवा लड़के-लड़कियों के शोषण का माध्यम न बनने दें। कोर्ट ने चेताया कि यदि बिना वास्तविक खतरे के सुरक्षा याचिकाएं दायर करने का चलन बढ़ा तो इसका दुष्प्रभाव उन मामलों पर पड़ेगा, जहां ऑनर किलिंग या अन्य गंभीर खतरे वास्तव में मौजूद हैं।
यह टिप्पणी उस बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका की सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें पुलिस एक युवती को कोर्ट के समक्ष पेश कर लाई थी। अदालत में युवती ने बताया कि वह और उसका प्रेमी गिर्राज विवाह करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वकील आकाश गोयल से कानूनी सलाह ली। युवती के मुताबिक, वकील ने शादी कराने और हाईकोर्ट से पुलिस सुरक्षा का आदेश दिलाने के नाम पर पहले ही दिन 40 हजार रुपए लिए। इसके बाद वह दोनों को ग्वालियर स्थित आर्य समाज संस्कृति संस्थान ले गया, जहां उनका विवाह कराया गया।
बाद में कोर्ट परिसर में कुछ दस्तावेजों पर भी हस्ताक्षर कराए गए। सुनवाई के दौरान जब अदालत ने युवती से पूछा कि क्या उसे या उसके पति को किसी से जान का खतरा था, तो उसने साफ कहा कि ऐसा कोई खतरा नहीं था। इस पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब वास्तविक खतरा था ही नहीं, तब पुलिस सुरक्षा के लिए रिट याचिका दायर करना केवल एक 'कांट्रैक्ट' के तहत की गई औपचारिक कार्रवाई प्रतीत होती है।
पति के साथ रहने की अनुमति
चूंकि युवती बालिग है और उसने अपनी इच्छा से विवाह किया है तथा पति के साथ रहने की इच्छा जताई, इसलिए हाईकोर्ट ने पुलिस को आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर उसे उसके पति के सुपुर्द करने का निर्देश दिया।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश कुमार शुक्ला ने अदालत को बताया कि ग्वालियर के जिंसी मार्ग स्थित आर्य समाज संस्कृति संस्थान को विवाह कराने का वैधानिक अधिकार है या नहीं, इसकी अब तक जांच नहीं हुई थी। न संस्था के उपनियमों का परीक्षण किया गया और न ही उसके पंजीकरण की वैधानिक स्थिति की पुष्टि की गई। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि पुलिस यह भी जांच करेगी कि संस्था कानून के तहत अधिकृत है या नहीं तथा क्या तीसरे पक्ष के माध्यम से मोटी रकम लेकर विवाह कराना किसी संगठित व्यवस्था का हिस्सा है।