
Gwalior HighCourt decision:मध्यप्रदेश में ग्वालियर हाईकोर्ट की सिंगल बैच ने एक फैसले में मृतका के मायके पक्ष द्वारा ससुराल पक्ष के तीन अन्य सदस्यों को अतिरिक्त आरोपी के रूप में शामिल करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत किसी को अतिरिक्त आरोपी बनाने की शक्ति एक असाधारण और विवेकाधीन शक्ति है, जिसका उपयोग बेहद सतर्कता और पुख्ता सबूत होने पर ही किया जाना चाहिए।
केवल गवाहों के बयानों में नाम आ जाने मात्र से किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता है। जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की बैच ने याचिकाकर्ता शब्बीर खान द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई करते हुए पारित किया।
याचिकाकर्ता शब्बीर खान की बेटी फौजिया का विवाह 12 अप्रैल 2013 को मुजीब खान के साथ मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था। शादी के बाद से ही ससुराल वालों द्वारा दहेज की मांग को लेकर मृतका को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाने लगा। लगातार उत्पीड़न से तंग आकर फौजिया को अपने मायके में शरण लेनी पड़ी, जहां मानसिक तनाव और बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण 13 दिसंबर 2017 को ब्रेन इन्फार्शन (स्ट्रोक) से उसकी मृत्यु हो गई।
इसके बाद पुलिस थाना करेरा (जिला शिवपुरी) में मृतका के पति मुजीब और ससुर रसीद खान के खिलाफ धारा 304-बी और 34 के तहत मामला दर्ज कर आरोप पत्र दाखिल किया गया था हालांकि, पुलिस जांच में मृतका की सास राबिया, ननद अंजुम और ननदोई महफूज को आरोपी नहीं बनाया गया था। जिला कोर्ट ने आरोपी बनाने का आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने निचली अदालत के निष्कर्षों में कोई अवैधता या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि नहीं है। केवल गवाहों के बयानों में नाम होने से किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
वहीं बीते दिनों पहले प्रेम विवाह के बाद पुलिस सुरक्षा के लिए दायर की जाने वाली याचिकाओं की बढ़ती प्रवृत्ति पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने स्पष्ट कहा कि पुलिस संरक्षण के लिए रिट याचिका दायर करना शादी का आठवां फेरा नहीं बन जाना चाहिए।
अदालत ने वकीलों को भी नसीहत दी कि वे अपने सम्मानित दफ्तरों का इस्तेमाल विवाह के इच्छुक युवा लड़के-लड़कियों के शोषण का माध्यम न बनने दें। कोर्ट ने चेताया कि यदि बिना वास्तविक खतरे के सुरक्षा याचिकाएं दायर करने का चलन बढ़ा तो इसका दुष्प्रभाव उन मामलों पर पड़ेगा, जहां ऑनर किलिंग या अन्य गंभीर खतरे वास्तव में मौजूद हैं।