सरकार के हाथ से एक बाद एक सरकारी जमीनें हाथ से निकल रही हैं, लेकिन विभागों की सरकारी जमीनों को बचाने में सुस्ती व लापरवाही बनी हुई है। ऐसा ही एक मामला पुलिस विभाग की जड़ेरुआ खुर्द स्थित 14 बीघा जमीन का सामने आया है। हाईकोर्ट में 17 साल प्रकरण चला, लेकिन पुलिस रामसेवक के वारिश को याचिका में नहीं जोड़ पाई और हाईकोर्ट ने एबेटेड (मृत व्यक्ति के खिलाफ केस नहीं चल सकता) मानकर याचिका खारिज कर दी। याचिका खारिज होने के 9 महीने पुलिस ने री स्टोर का आवेदन लगाया और न अपील दायर की। फाइल पुलिस विभाग में अधिकारी दबा कर बैठ गए।
सरकार के हाथ से एक बाद एक सरकारी जमीनें हाथ से निकल रही हैं, लेकिन विभागों की सरकारी जमीनों को बचाने में सुस्ती व लापरवाही बनी हुई है। ऐसा ही एक मामला पुलिस विभाग की जड़ेरुआ खुर्द स्थित 14 बीघा जमीन का सामने आया है। हाईकोर्ट में 17 साल प्रकरण चला, लेकिन पुलिस रामसेवक के वारिश को याचिका में नहीं जोड़ पाई और हाईकोर्ट ने एबेटेड (मृत व्यक्ति के खिलाफ केस नहीं चल सकता) मानकर याचिका खारिज कर दी। याचिका खारिज होने के 9 महीने पुलिस ने री स्टोर का आवेदन लगाया और न अपील दायर की। फाइल पुलिस विभाग में अधिकारी दबा कर बैठ गए। एसडीएम मुरार ने इस पूरी बेशकीमती जमीन को लेकर अपील के लिए पुलिस को पत्र भी जारी किए। दो बार स्मरण पत्र भी दिया। इस लापरवाही के चलते पुलिस के हाथ से जड़ेरुआ खुद की 100 करोड़ की जमीन हाथ से निकल सकती है।
दरअसल जड़ेरुआ खुर्द में पुलिस की विभाग के 15 सर्वे नंबर की 14 बीघा जमीन है। इस जमीन के पुराने खसरों में पुलिस विभाग दर्ज है। 14 बीघा जमीन पर रामसेवक ने दावा पेश किया। रामसेवक ने जमीन पर एक पक्षीय डिक्री हासिल कर ली। जब शासन को एक पक्षीय डिक्री की जानकारी मिली तो न्यायालय में आवेदन लगाया, लेकिन जिला कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी। इसके बाद शासन ने 2007 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की। तर्क दिया कि प्रदेश में सरकार बदलने के बाद शासकीय अधिवक्ताओं का बदलाव हुआ। इस बदलाव के चलते जानकारी नहीं सकी। शासन की बेशकीमती जमीन है। 2007 से याचिका लंबित थी। 2008 में रामसेवक का निधन हो गया, लेकिन पुलिस ने उसके वारिशों को याचिका में पार्टी नहीं बनाया। मृत व्यक्ति के खिलाफ केस नहीं चल सकता है।
- हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए गंभीर टिप्पणी की की। मूल प्रतिवादी रामसेवक के 2008 में निधन हो जाने के बाद भी उनके कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाने की औपचारिकता तक पूरी नहीं की।
-सरकार को कई बार मौका दिया गया, लेकिन बार-बार समय बढ़ाने के बावजूद किसी भी तरह की पहल नहीं की गई। कोर्ट ने 24 सितंबर 2024 को ही सरकार के वकील को निर्देश दिए थे कि वे मामले की जांच कर मृतक प्रतिवादी के कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड में लाने के लिए आवेदन प्रस्तुत करें। इसके बाद भी 19 नवंबर 2024 को अंतिम अवसर प्रदान किया गया, मगर सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया गया।
-याचिका को आगे सुनने का कोई औचित्य नहीं रह जाता और इसे "एबेटेड" (अप्रभावी) मानकर खारिज कर दिया गया। कोर्ट का यह आदेश सरकार की उदासीनता पर सीधा सवाल खड़ा करता है कि आखिर इतने लंबे समय तक मुकदमे को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया।
सर्वे क्रमांक हेक्टेयर में
100 6 विस्वा
104 15 विस्वा
105 6 विस्वा
122 6 विस्वा
123 1.2 बीघा
126 11 विस्वा
133 1.3 बीघा
141 8 विस्वा
144 4.8 बीघा
145 6.16 बीघा
145 15 विस्वा
171 19 विस्वा
योग 14 बीघा
- पुलिस विभाग की जमीन है। प्रकरण के प्रभारी मुरार सीएसपी है। अपील के लिए मुरार सीएसपी को पत्र भेजा था। स्मरण पत्र भी जारी किए गए हैं। पुलिस को इसमें अपील दायर करनी है।
नरेश गुप्ता, एसडीएम मुरार
- गोले के मंदिर थाने की जमीन को लेकर राजस्व विभाग से पत्र आया था। इसमें डिप्टी कलेक्टर को केस प्रभारी बनाने के लिए पत्र लिखा था। वर्तमान में क्या स्टेटस है। इस फाइल को दिखवाते हैं।
अतुल सोनी, सीएसपी मुरार