
-योगेंद्र कुमार गुप्ता
संगरिया (हनुमानगढ़): कभी उन गलियों में बच्चों की चहल-पहल और उनकी हंसी गूंजती थी। शाम होते ही चौपालों पर बुजुर्ग बैठते और युवा खेल के मैदानों में नजर आते थे। मगर अब कस्बे के वार्ड एक और दो की यह तस्वीर बदल चुकी है। यहां लोगों के मुताबिक सबसे बड़ी समस्या यहां टूटी सड़कें या नालियां नहीं, बल्कि चिट्टे का नशा बन चुका है। नशे के कारण कई घरों के चिराग बुझ गए हैं। कई परिवार अपने बेटों को नशे के दलदल से निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जबकि कुछ युवा खुद हाथ जोड़कर कहते हैं कि हमें बचा लो, हम नशा छोड़ना चाहते हैं।
पत्रिका पड़ताल के दौरान वार्ड एक में लोगों ने बताया कि खाली पड़े परिसर, नर्सरी रोड, सामुदायिक केंद्र और सुनसान जगहों पर नशेड़ियों का जमावड़ा रहता है। आरोप है कि चिट्टा 300 से 1000 रुपए तक में आसानी से मिल जाता है। लोगों ने आरोप लगाया कि नशा बेचने वालों के खिलाफ सख्ती नहीं हो रही। उनका कहना है कि केवल छोटे उपभोक्ताओं को पकड़ने से समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि पूरे नेटवर्क पर कार्रवाई और अवैध संपत्तियों की जांच जरूरी है।
वार्ड दो निवासी बग्गा सिंह बताते हैं कि गुरदीप सिंह का 22 वर्षीय बेटा गगन दिल्ली में वेल्डिंग मिस्त्री का काम करता था। मेहनत से परिवार का सहारा बनने निकला बेटा चिट्टे के इंजेक्शन की ओवरडोज का शिकार हो गया। उसकी मौत के बाद परिवार गहरे सदमे से टूट गया और गांव छोड़कर श्रीविजयनगर में अपने रिश्तेदारों के पास रहने चला गया।
जनसेवक मेजर सिंह कहते हैं कि चिट्टे पर प्रभावी रोक नहीं लगी तो समाज को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। जब युवाओं के हाथों में किताबों की जगह चिट्टा होगा तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। यह केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर संकट है, जिसका समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।
डीएसपी रमेश माचरा ने बताया कि पुलिस चिट्टे के खिलाफ लगातार अभियान चला रही है। मादक पदार्थ तस्करी से जुड़े आरोपियों की गिरफ्तारी और चिट्टा बरामद करने की कार्रवाई जारी है। बुधवार को भी संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर 32 लोगों को पकड़ा गया। जहां भी विश्वसनीय सूचना मिलेगी, वहां तत्काल कार्रवाई की जाएगी।
वार्ड दो निवासी प्रेम कुमार (48) पुत्र धर्मपाल बताते हैं कि उनका बड़ा बेटा अजय (21) शादी समारोहों में घोड़ा-बग्घी के साथ काम करता था। चिट्टे की लत लगने पर परिवार ने हनुमानगढ़ में इलाज कराया और हरसंभव प्रयास किए, लेकिन दो वर्ष पहले उसकी मौत हो गई। बेटे को बचाने के लिए हर दरवाजा खटखटाया, लेकिन नशा जीत गया।
वार्ड एक निवासी बाबा धीरा सिंह बताते हैं कि पिछले वर्ष मोहल्ले के युवाओं के साथ मिलकर उन्होंने चिट्टे के खिलाफ रात में पहरा शुरू किया था। इससे कुछ समय तक नशेड़ियों में डर बना, लेकिन विवाद और मुकदमों के बाद अभियान बंद करना पड़ा। मोहल्ले में खुलेआम नशा होता है और बच्चों के भविष्य को लेकर परिवारों में डर का माहौल है।
लोहे के जाल बनाकर गुजारा करने वाले जसविंद्र सिंह (60) पुत्र गुरनाम सिंह बताते हैं कि उनका 21 वर्षीय इकलौता बेटा करणदीप सिंह दिल्ली में मोबाइल रिपेयरिंग का काम करता था। चिट्टे की लत ने उसे जकड़ लिया और 29 जून 2024 को ओवरडोज से उसकी मौत हो गई। दो बहनों के इकलौते भाई को खोने के बाद बेटे के साथ सब खुशियां ही चली गई।
वार्ड दो निवासी छिंदो बाई (55) पत्नी विक्रम सिंह बताती हैं कि उनका 25 वर्षीय विवाहित बेटा बबलू चिट्टे की ओवरडोज के कारण दुनिया छोड़ गया। घर में अब वृद्ध मां, विधवा बहू और मासूम पोती हैं। मजदूरी कर परिवार चलाती हैं। मेरा बेटा तो वापस नहीं आएगा। लेकिन अब किसी दूसरी मां की गोद नशे से सूनी नहीं होनी चाहिए।