हनुमानगढ़

Hanumangarh : राजस्थान के करीब 12 जिलों में जल संकट रहने की संभावना, कृषि विभाग ने बनाया खेती का नया प्लान

Rajasthan : कमजोर मानसून का सीधा असर राजस्थान के करीब 12 जिलों पर पड़ेगा। कृषि विभाग ने नहरी पानी के संकट को देखते हुए कुछ विशेष किस्मों के बीज का उपयोग बिजाई के वक्त करने की सलाह दी है।
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Hanumangarh : फाइल फोटो पत्रिका।

Rajasthan : हनुमानगढ़. इस बार बांधों के जल ग्रहण क्षेत्रों में मानसून बेहद कमजोर रहा है। इसका सीधा असर राजस्थान के करीब 12 जिलों पर पड़ेगा। कृषि विभाग के अधिकारियों ने नहरी पानी के संकट को देखते हुए कुछ विशेष किस्मों के बीज का उपयोग बिजाई के वक्त करने की सलाह दी है। ताकि उपलब्ध पानी में अच्छा उत्पादन लिया जा सके। इसके अलावा कम सिंचाई पानी में तैयार होने वाली फसलों की बिजाई के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है।

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि गेहूं की फसल को ज्यादा सिंचाई पानी की जरूरत पड़ती है। दलहन फसलों की खेती में कम सिंचाई पानी की जरूरत पड़ती है। अधिक पानी वाली फसलों जैसे गेहूं की जगह कम पानी वाली फसल जैसे सरसों, चना और जौ की जलवायु अनुकूल किस्मों की खेती करने को लेकर किसानों को प्रेरित किया जा रहा है।

भौगौलिक दृष्टिकोण से देखेंगे तो हनुमानगढ़ जिले में आधे से ज्यादा कृषि क्षेत्र में कम पानी और हल्की मिट्टी है। इसको देखते हुए सरसों और चने की कुछ खास किस्मों की खेती की जा सकती है। इसमें सरसों की आरएच 1975 एवं आरएच 1706 का चयन अधिक पैदावार के साथ तेल की गुणवत्ता के लिए कर सकते हैं।

वहीं सेम ग्रस्त इलाकों में सीएस 58, सीएस 60, सीएस 62 किस्मों की खेती हो सकती है। रेतीली एवं टिब्बा क्षेत्र में आरएच 1424, आरएच 725 या आरएच 761 तथा देरी से बिजाई के लिए आरजीएन 236 का चयन कर सकते हैं। चने की सिंचित एवं समय पर बिजाई के लिए जीएनजी 2171 (मीरा) तथा पछेती बुवाई के लिए जीएनजी 2261 (केशव) का चयन किया जा सकता है। असिंचित क्षेत्र में जीएनजी 2461 (मूमल) को उगाकर अच्छी पैदावार ली जा सकती है।

कम पानी वाली फसलों की बिजाई के लिए किया जा र​हा प्रेरित

कृषि अनुसंधान अधिकारी राजेंद्र कुमार के अनुसार विभाग स्तर पर किसानों को कम सिंचाई पानी वाली फसलों की बिजाई को लेकर प्रेरित किया जा रहा है। खेती में लागत घटाकर ही इसे फायदमेंद बनाया जा सकता है। इस बात को किसानों को समझना होगा।

45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उत्पादन

बेहतर स्वास्थ्य, कम लागत एवं पोषण सुरक्षा के लिए छिलका रहित जौ की नई किस्म डीब्ल्यूआरबी 223 का उपयोग किया जा सकता है। भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल द्वारा विकसित छिलका रहित जौ की उक्त नई किस्म मधुमेह रोगियों के लिए वरदान है। छिलका रहित दाना खाने में आसान है। इसकी रोटी, दलिया एवं बिस्किट आदि बना सकते हैं। इसकी खेती करने पर गेहूं की तुलना में लगभग 30-40 प्रतिशत कम पानी एवं उर्वरकों की जरूरत पड़ती है। इसकी औसतन पैदावार 45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर मानी जा रही है।

दो सिंचाई में तैयार हो रही गेहूं

डब्ल्यूएच 1402, डब्ल्यूएच 1142 और डीबीडब्ल्यू 296 क्षेत्र के किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की ओर से इसे विकसित किया गया है। गेहूं की किस्म 1402 केवल 2 सिंचाई में टिकाऊ उत्पादन देने की क्षमता रखती है। इसमें पहली सिंचाई बुवाई के लगभग 25 दिन पर तथा दूसरी सिंचाई लगभग 70-80 दिन पर करने की सिफारिश की गई है। इसमें बुवाई के 100 दिन पर बालियां निकालकर 147 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

खेती के लिहाज से मिजाज बदलने की जरूरत

कृषि अधिकारियों के अनुसार अलनीनो के प्रभाव से बांधों के जलस्तर में भारी गिरावट, बदलती जलवायु, बढ़ते तापमान, सीमित सिंचाई जल और बढ़ती उत्पादन लागत के बीच गेहूं उत्पादन को अधिक जल-कुशल, जलवायु अनुकूल एवं टिकाऊ बनाने की आवश्यकता बढ़ रही है। क्षेत्र में गेहूं उत्पादन के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में सिंचाई जल की उपलब्धता, बढ़ता तापमान और मौसम की अनिश्चितता शामिल है। ऐसे में केवल अधिक उपज क्षमता वाली किस्मों पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी किस्मों को उगाना चाहिए जो सीमित जल एवं स्थानीय जलवायु के अनुरूप स्थिर उत्पादन दे सकें।

Updated on:
02 Oct 2026 05:22 pm
Published on:
02 Oct 2026 05:21 pm