Cancer Treatment: Journal of Thoracic Oncology के अनुसार भारत में कैंसर मामलों में फेफड़ों के कैंसर का हिस्सा 5.5% है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई विधि खोजी है जो फेफड़ों के कैंसर के साथ उसके दुष्प्रभाव कैशेक्सिया (मांसपेशियों का गलना) का एक साथ इलाज कर सकती है। आइए डॉ तरंग कृष्णा से जानते है कि फेफड़ों के कैंसर से लक्षण क्या-क्या होते हैं।
Cancer Treatment: वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई विधि खोजी है जो फेफड़ों के कैंसर के साथ उसके दुष्प्रभाव कैशेक्सिया (मांसपेशियों का गलना) का एक साथ इलाज कर सकती है। कैंसर के इलाज में चुनौती यह होती है कि मरीज का शरीर इलाज झेलने के लायक बचा है या नहीं। फेफड़ों के कैंसर के लगभग 80% मरीजों में मांसपेशियां तेजी से कम होने लगती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में कैशेक्सिया (Cachexia) कहते हैं। आइए. डॉ तरंग कृष्णा से जानते है कि फेफड़ों के कैंसर से लक्षण क्या-क्या होते हैं।
Journal of Thoracic Oncology के अनुसार भारत में कैंसर मामलों में फेफड़ों के कैंसर का हिस्सा 5.5% है। इसलिए, इस बात को गौर से समझना भी जरूरी है-
आपने देखा होगा कि कैंसर के मरीज दिखने में बहुत दुबले-पतले दिखाई देते है। सब सोचते हैं कि कम खाने की वजह से ऐसा हुआ है। असल में कैंसर कोशिकाएं हमारे शरीर को ऐसे सिग्नल भेजती हैं जिससे शरीर अपनी ही मांसपेशियों (Muscles) और फैट को खाने लगता है। इसकी वजह से मरीज का शरीर कमजोर हो जाता है कि वह कीमोथेरेपी के भारी डोज को सहन नहीं कर पाता। फेफड़ों के कैंसर के मरीजों में 30% मौतें कमजोरी के कारण होती हैं।
जब कैंसर बढ़ता है, तो वह इसी रास्ते के जरिए मांसपेशियों को नष्ट करने का संदेश भेजता है। शोधकर्ताओं ने पाया कि अगर इस खास सिग्नल को बीच में ही ब्लॉक (Block) कर दिया जाए, तो कैंसर और मांसपेशियों का गलना, दोनों रुक सकते हैं। वैज्ञानिकों ने शरीर के अंदर एक खास मॉलिक्यूलर पाथवे (Molecular Pathway) की पहचान की है। यह रास्ता कैंसर की कोशिकाओं और मांसपेशियों के बीच एक पुल का काम करेगा।
नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) में प्रकाशित इस स्टडी में कैंसर रिसर्च यूके स्कॉटलैंड इंस्टीट्यूट (Cancer Research UK Scotland Institute) और ग्लासगो यूनिवर्सिटी (University of Glasgow) के शोधकर्ता शामिल थे। इससे मरीज का शरीर मजबूत रहेगा, तो वह कैंसर के अन्य इलाजों को बेहतर तरीके से रिस्पॉन्स दे पाएगा। इलाज के दौरान मरीज बिस्तर पर पड़ने के बजाय अपनी रोजमर्रा की गतिविधियां करने में सक्षम रहेगा।
डिसक्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह किसी क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प नहीं है। इसलिए पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।