Laughing Epilepsy Treatment: AIIMS जोधपुर ने लाफिंग एपिलेप्सी से पीड़ित 4 बच्चों का सफल इलाज किया। जानिए इस दुर्लभ बीमारी और नई तकनीक के बारे में।
Laughing Epilepsy Treatment: अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान (All India Institute of Medical Sciences Jodhpur) ने एक बड़ी मेडिकल सफलता हासिल की है। यहां डॉक्टरों ने लाफिंग एपिलेप्सी यानी हंसी वाली मिर्गी से पीड़ित चार बच्चों का सफल इलाज किया है। यह एक बहुत ही दुर्लभ और परेशान करने वाली बीमारी है, जिसमें बच्चों को बिना किसी वजह के अचानक हंसी के दौरे पड़ते हैं।
लाफिंग एपिलेप्सी, जिसे मेडिकल भाषा में gelastic seizures कहा जाता है, एक ऐसा न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है जिसमें मरीज को अचानक हंसी आने लगती है, लेकिन इसका खुशी या मजाक से कोई लेना-देना नहीं होता। यह समस्या दिमाग में होने वाली असामान्य इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी की वजह से होती है। कई मामलों में यह दिमाग के एक हिस्से, जिसे hypothalamus कहते हैं, में छोटी सी गांठ (hypothalamic hamartoma) के कारण होती है।
इस बीमारी से पीड़ित बच्चों को दिन में 10–20 बार तक दौरे पड़ सकते हैं। इससे उनकी पढ़ाई, खेलकूद और सामान्य जीवन पर बुरा असर पड़ता है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि आम मिर्गी की दवाएं इस पर अक्सर असर नहीं करतीं। साथ ही, दिमाग के अंदर गहराई में होने की वजह से इसका ऑपरेशन भी जोखिम भरा होता है।
AIIMS जोधपुर के डॉक्टरों ने एक एडवांस तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसे stereotactic radiofrequency ablation कहा जाता है। इस प्रक्रिया में कंप्यूटर की मदद से दिमाग में समस्या वाली जगह को सटीक ढूंढा जाता है। एक छोटा सा कट लगाकर पतली प्रोब अंदर डाली जाती है। फिर हीट एनर्जी से उस खराब टिश्यू को खत्म किया जाता है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें ओपन ब्रेन सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे खतरा और रिकवरी टाइम दोनों कम हो जाते हैं।
इस इलाज के रिजल्ट काफी शानदार रहे। चारों बच्चों की सर्जरी सफल रही। कोई बड़ी परेशानी सामने नहीं आई। 48 घंटे के अंदर बच्चों को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। सबसे अहम बात ये है कि अब उन्हें दौरे नहीं पड़ रहे है। यह उनके परिवारों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।
यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत में अब एडवांस इलाज तेजी से उपलब्ध हो रहा है। AIIMS जोधपुर राजस्थान का पहला और देश का दूसरा ऐसा AIIMS बन गया है जहां यह खास इलाज किया जा रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि अगर इस बीमारी को समय पर पहचान लिया जाए, तो बच्चों को बड़ी परेशानियों से बचाया जा सकता है। बार-बार दौरे पड़ने से दिमाग के विकास और व्यवहार पर असर पड़ सकता है।