Long COVID क्यों महीनों तक बना रहता है? नई रिसर्च में इसके जेनेटिक कारण और 3 अलग सबटाइप सामने आए। आसान भाषा में जानिए पूरी जानकारी।
Long COVID Symptoms: कोरोना संक्रमण से ठीक होने के बाद भी कई लोगों की परेशानियां खत्म नहीं होतीं। थकान, सांस फूलना, दिमागी धुंध (ब्रेन फॉग), दिल की दिक्कत, शुगर या इम्युनिटी से जुड़ी समस्याएं महीनों-सालों तक बनी रह सकती हैं। इसी स्थिति को लॉन्ग कोविड कहा जाता है। अनुमान है कि कोविड से संक्रमित हुए करीब 10-20% लोग लॉन्ग कोविड का शिकार हो जाते हैं। इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद, अब तक यह साफ नहीं था कि आखिर इसके पीछे असली जैविक कारण क्या हैं।
अब एक नई रिसर्च ने इस दिशा में बड़ी जानकारी दी है। इस स्टडी में वैज्ञानिकों ने बेहद आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर यह समझने की कोशिश की कि लॉन्ग कोविड शरीर में आखिर क्यों और कैसे बना रहता है।
इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई तरह के डेटा को एक साथ जोड़ा, जैसे जेनेटिक जानकारी, जीन की एक्टिविटी, RNA स्टडी और जीन नेटवर्क एनालिसिस। आसान शब्दों में कहें तो उन्होंने यह देखा कि कौन-कौन से जीन लॉन्ग कोविड में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इस गहराई से की गई जांच के बाद वैज्ञानिकों ने 32 ऐसे जीन पहचाने, जो लॉन्ग कोविड से सीधे जुड़े हो सकते हैं। इनमें से 19 जीन पहले से कुछ हद तक जाने जाते थे, जबकि 13 जीन बिल्कुल नए हैं। ये जीन इम्यून सिस्टम, वायरस से लड़ने की क्षमता, कोशिकाओं की ग्रोथ और सूजन जैसी प्रक्रियाओं से जुड़े पाए गए।
इस स्टडी की सबसे अहम खोज यह रही कि लॉन्ग कोविड कोई एक जैसी बीमारी नहीं है। वैज्ञानिकों ने इसे तीन अलग-अलग जैविक प्रकार (सबटाइप) में बांटा है। हर सबटाइप में जीन का व्यवहार अलग है और उसी के हिसाब से मरीजों के लक्षण भी अलग-अलग दिखते हैं। यही वजह है कि किसी को ज्यादा थकान और ब्रेन फॉग रहता है, तो किसी को दिल, मेटाबॉलिज्म या इम्यून सिस्टम से जुड़ी दिक्कतें ज्यादा होती हैं।
रिसर्च में यह भी सामने आया कि लॉन्ग कोविड का रिश्ता ऑटोइम्यून बीमारियों, मेटाबॉलिक डिसऑर्डर, कनेक्टिव टिश्यू डिजीज और कुछ सिंड्रोम्स से भी जुड़ा हो सकता है। इससे यह संकेत मिलता है कि शरीर में लंबे समय तक रहने वाली सूजन और इम्युनिटी की गड़बड़ी इसकी बड़ी वजह हो सकती है।
डॉक्टरों के लिए यह स्टडी बहुत अहम है, क्योंकि अब लॉन्ग कोविड को सिर्फ लक्षणों के आधार पर नहीं, बल्कि जैविक कारणों के आधार पर समझा जा सकता है। भविष्य में इससे सही जांच (बायोमार्कर) जोखिम वाले मरीजों की पहचान और पहले से मौजूद दवाओं के नए इस्तेमाल का रास्ता खुल सकता है। वैज्ञानिकों ने एक ओपन-एक्सेस ऑनलाइन टूल भी बनाया है, जिससे रिसर्चर्स और डॉक्टर जीन और सबटाइप को आसानी से समझ सकें।