बेनेडिक्ट कंबरबैच आज यानी 19 जुलाई को 46 साल के हो गए। वह बड़े पर्दे पर ब्रिटिश जासूस शर्लक होम्स के साथ-साथ मार्वल यूनिवर्स में डॉक्टर स्ट्रेज का किरदार निभाने के लिए मशहूर हैं। कंबरबैच को एक अकादमी और प्राइमटाइम एमी के साथ-साथ एक लारेंस ओलिवियर अवॉर्ड मिल चुका है। इसके अलावा दो आकदमी, दो ब्रिटिश अकादमी चार गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड के लिए भी वह नॉमिनेट हो चुके हैं।
2014 में, टाइम पत्रिका ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल किया. 2015 में उन्हें कला और दान के लिए सेवाओं के लिए बकिंघम पैलेस में सीबीई बनाया गया। इसके अलावा फिल्म 'हॉकिंग', मिनिसरीज 'पैट्रिक मेलरोज', 'स्टार ट्रेक इनटू डार्कनेस', '12 इयर्स ए स्लेव', 'द इमिटेशन गेम', 'द पावर ऑफ द डॉग में भी उनके काम की तारीफें की गईं। इसके अलावा 2012 से 2014 तक 'द हॉबिट' सिरीज में स्मॉग और सौरोन की भी भूमिका निभाया।
यहां हम बेनेडिक्ट कंबरबैच के जन्मदिन पर कुछ अनजाने पहलुओं के बारे में बता रहे हैं, जिसके बारे में उनके प्रशसंक भी शायद नहीं जानते होंगे-
- बेनेडिक्ट कंबरबैच को अपना नाम नहीं पसंद है क्योंकि उसका उच्चारण करना बेहद कठिन है।
- बेनेडिक्ट कंबरबैच की आंखों का रंग बदलता रहता है। वह हेटेरोक्रोमिया इरिडिस नामक एक बीमारी से पीड़ित हैं। इस बीमारी की वजह से आंखें कभी नीली और कभी हरी दिखाई देती है।
- एक अभिनेता के तौर पर उनको अपने स्टिंट की पहचान सबसे पहली पहली बार प्राइमरी स्कूल में एक थियेटर कार्यक्रम के दौरान हुआ था। कंबरबैच याद करते हैं। उस वक्त उनमें धैर्य बिल्कुल नहीं था। उन्होंने एक्ट्रेस मैरी मंच से बाहर धकेल दिया क्योंकि वह स्टेज पर आने में बहुत अधिक समय ले रही थीं।
- कंबरबैच के माता-पिता भी अभिनेता हैं। वास्तव में, उनके असली माता-पिता, टिमोथी कार्लटन और वांडा वेंथम ने भी 'शर्लक' में उनके रील माता-पिता की भूमिका निभाई थी।
- कंबरबैच ने शर्लक होम्स की भूमिका नहीं मिलने वाली थी। मेकर्स को उनके नाक की साइज पसंद नहीं था। निर्माताओं का मानना था कि इस नाक की साइज के साथ वह सेक्सी बिल्कुल नहीं दिखते थे।
- 'टू द एंड्स ऑफ द अर्थ' की शूटिंग के दौरान दक्षिण अफ्रीका में कंबरबैच को किडनैप कर लिया गया था। उन्हें और उनके सह-कलाकारों को लूटा गया था और खुद के शूलेस से बांध दिया गया था।
- कंबरबैच एक साल तक अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे। ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने एक साल की छुट्टी ली और भारत के दार्जिलिंग के एक मठ में तिब्बती बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाया।