
प्रकृति के प्रति लगाव
सुनंदा का यह बगीचा वर्षों के प्रयोग, धैर्य और प्रकृति के प्रति लगाव का परिणाम है। उनका सवाल था कि क्या उत्तर कर्नाटक की मिट्टी और जलवायु में दुर्लभ फल प्रजातियों को उगाया जा सकता है? इसी जिज्ञासा ने उन्हें अलग-अलग बीज और पौधों पर प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया। कई प्रयास असफल हुए, लेकिन उन्होंने प्रयोग जारी रखे।
बचपन के बीजों से शुरू हुआ सफर
पौधों के प्रति सुनंदा का लगाव बचपन से है। उनके पिता धनजय चिगारी खेती और बीजों में रुचि रखते थे। 1970 के दशक में वे अलग-अलग किस्मों के बीज जुटाकर उन्हें उगाने का प्रयास करते थे। पिता से मिली यही सीख सुनंदा के जीवन में आगे बढ़ती गई। बचपन में वह रसोई में इस्तेमाल होने के बाद बचे सब्जियों और फलों के बीजों को फेंकने के बजाय मिट्टी में लगा देती थीं। कुछ बीज चींटियां खा जातीं, कुछ खराब हो जाते, लेकिन कई अंकुरित भी होते। यहीं से पौधों को समझने और नए प्रयोग करने की रुचि विकसित हुई।
जैविक तरीकों से तैयार किया बगीचा
सुनंदा ने पौधों की जरूरत के मुताबिक मिट्टी तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया। नीम, जैविक खाद और रसोई से निकलने वाले गीले कचरे का इस्तेमाल खाद के रूप में किया। बाद में उन्होंने बीज उपचार, अंकुरण और प्राकृतिक उर्वरकों के बारे में भी अध्ययन किया। वह बगीचे में पैदा होने वाले फल बेचती नहीं हैं। इन्हें रिश्तेदारों, मेहमानों और यहां आने वाले लोगों के साथ साझा करती हैं। उनके लिए बगीचा कमाई का साधन नहीं, बल्कि प्रयोग और सीखने का माध्यम है।
बच्चों के लिए बनी प्राकृतिक प्रयोगशाला
अब हेसरूर सरकारी स्कूल के विद्यार्थी भी इस बगीचे में पहुंच रहे हैं। बच्चे अलग-अलग फलदार पेड़ों और औषधीय पौधों को देखकर उनके बारे में जानकारी हासिल करते हैं। सुनंदा के पास हाल्लीकर और गिर नस्ल की गायें भी हैं। फलदार पेड़ों, औषधीय पौधों और पशुपालन से जुड़ा यह परिसर सूखे क्षेत्र में जैव-विविधता की अनोखी मिसाल बन गया है। आज सुनंदा का बगीचा सिर्फ उनका निजी शौक नहीं रहा। यह बच्चों के लिए जीवंत कक्षा और प्रकृति को समझने की खुली प्रयोगशाला बन चुका है।