
पारंपरिक फसलों से बागवानी की ओर
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर बाजार मूल्य, दीर्घकालिक आय और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार ने किसानों को पारंपरिक फसलों से बागवानी की ओर आकर्षित किया है। हालांकि इसके साथ ही पानी की उपलब्धता और जलवायु परिवर्तन को लेकर नई चिंताएं भी सामने आई हैं। भारत में सुपारी उत्पादन में कर्नाटक का दबदबा कायम है। भारत की करीब 73 प्रतिशत सुपारी अकेले कर्नाटक में पैदा होती है। राज्य में लगभग 6.77 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में इसकी खेती की जा रही है। दशकों तक सुपारी की खेती मुख्य रूप से शिवमोग्गा, उत्तर कन्नड़, दक्षिण कन्नड़, उडुपी और चिकमगलूरु जैसे अधिक वर्षा वाले जिलों तक सीमित थी। लेकिन पिछले दो दशकों में इसका विस्तार दावणगेरे, हावेरी, टुमकूरु, चित्रदुर्ग के सिंचित इलाकों तथा हासन के कुछ हिस्सों तक हो गया है। कृषि अनुसंधानों के अनुसार गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में सुपारी के रकबे में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। इसका प्रमुख कारण सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, ड्रिप तकनीक का बढ़ता उपयोग और किसानों का अधिक लाभ वाली बागवानी फसलों की ओर रुझान है।
अतिरिक्त आय अर्जित
विशेषज्ञों का कहना है कि ज्वार, धान और अन्य पारंपरिक फसलों की तुलना में सुपारी किसानों को लंबे समय तक नियमित आय का अवसर देती है। सुपारी का पौधा रोपण के लगभग पांच से सात वर्ष बाद व्यावसायिक उत्पादन देना शुरू करता है और 30 से 40 वर्ष या उससे अधिक समय तक उपज देता है। शुरुआती वर्षों में किसान सुपारी के साथ केला, काली मिर्च और अदरक जैसी अंतरवर्ती फसलें लेकर अतिरिक्त आय भी अर्जित करते हैं। यही वजह है कि कई क्षेत्रों में किसान पारंपरिक खेती से बागवानी की ओर बढ़ रहे हैं।
कितना मिलता है मुनाफा?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पूर्ण विकसित सुपारी बाग से उत्पादकता, बाजार भाव और प्रबंधन के आधार पर प्रति एकड़ दो से चार लाख रुपए तक की शुद्ध वार्षिक आय संभव है। हालांकि शुरुआती पांच से सात वर्षों तक पौधरोपण, सिंचाई और रखरखाव पर अच्छा-खासा निवेश करना पड़ता है। इसलिए इसे त्वरित नहीं बल्कि दीर्घकालिक निवेश वाली फसल माना जाता है।
पानी पर टिकी है पूरी तस्वीर
सुपारी अपेक्षाकृत अधिक पानी मांगने वाली फसल है। इसे पूरे वर्ष नियमित नमी की आवश्यकता होती है। पारंपरिक क्षेत्रों में यह जरूरत प्राकृतिक वर्षा से पूरी हो जाती है, लेकिन नए क्षेत्रों में किसान बोरवेल, नहरों और ड्रिप सिंचाई पर निर्भर हैं। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि ड्रिप सिंचाई से पानी की खपत में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है, लेकिन लगातार गिरते भूजल स्तर और अनियमित मानसून भविष्य के लिए चिंता का विषय हैं।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में अनियमित बारिश, लंबे सूखे दौर और अत्यधिक तापमान ने किसानों की चिंता बढ़ाई है। मौसम में तेजी से आ रहे बदलावों का असर सुपारी के उत्पादन और गुणवत्ता दोनों पर पड़ रहा है। इसके साथ ही फल गलन और येलो लीफ डिजीज जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वर्षा जल संचयन, सूक्ष्म सिंचाई और वैज्ञानिक बागवानी पद्धतियों को बढ़ावा नहीं दिया गया, तो भविष्य में इस फसल की लागत बढ़ सकती है।
निर्यात में भी बढ़ रही मांग
भारतीय सुपारी की मांग संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, मलेशिया, श्रीलंका, भूटान और मालदीव जैसे देशों में लगातार बनी हुई है। वर्ष 2024-25 में भारत से लगभग 2,396 टन सुपारी का निर्यात हुआ, जिसका मूल्य करीब 12.55 मिलियन अमरीकी डॉलर रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्ता सुधार, प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन पर ध्यान दिया जाए तो निर्यात की संभावनाएं और बढ़ सकती हैं।