
HDFC Life COVID 19 claim rejection: तेलंगाना राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने HDFC लाइफ इंश्योरेंस कंपनी को सेवा में भारी लापरवाही और कोताही का दोषी ठहराया है। आयोग ने बीमा कंपनी को एक पीड़ित विधवा महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उसे 76 लाख रुपए से अधिक का भुगतान करने का सख्त आदेश दिया है। कंपनी ने महिला के पति की कोविड-19 से मृत्यु होने के बाद उनके जीवन बीमा क्लेम को अनुचित तरीके से रद्द कर दिया था।
शिकायतकर्ता महिला के अनुसार, उनके पति ने 30 मार्च 2021 को HDFC बैंक से 55 लाख रुपए का गृह ऋण (Home Loan) लिया था। लोन की सुरक्षा के लिए उन्होंने HDFC लाइफ की ग्रुप इंश्योरेंस पॉलिसी चुनी, जिसका 81,053 रुपए का प्रीमियम उनके लोन खाते से काटा गया था। पॉलिसी लेने के कुछ ही हफ्तों बाद, 14 मई 2021 को कोरोना संक्रमण के कारण उनके पति की मौत हो गई। नामित (Nominee) होने के नाते महिला ने मृत्यु प्रमाण पत्र और आवश्यक दस्तावेज जमा किए, लेकिन लगातार पत्राचार और कानूनी नोटिस के बावजूद कंपनी ने वर्षों तक क्लेम अटकाए रखा और अंततः खारिज कर दिया।
HDFC लाइफ की ओर से अदालत में कहा गया कि बीमा पॉलिसी में कोविड-19 से होने वाली मौत का अलग से कोई विशेष कवर नहीं था। कंपनी का यह भी दावा था कि पॉलिसी लेते समय मृतक ने अपनी पहले से मौजूद बीमारियों, जैसे टाइप-2 डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर, की जानकारी नहीं दी, जिससे पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ। इसके अलावा, कंपनी ने यह भी दलील दी कि यह मामला 2021 का है और शिकायत तय समय सीमा के बाद दायर की गई, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
आयोग के अध्यक्ष मामिदी क्रिस्टोफर और सदस्यों एस. संध्या रानी व के. वेंकटेश्वरलू की पीठ ने कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड्स से पूर्व में डायबिटीज या हाइपरटेंशन होने की पुष्टि जरूर होती है, लेकिन केवल सामान्य जीवनशैली संबंधी बीमारियों के आधार पर क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। कंपनी यह साबित करने में नाकाम रही कि मृतक ने किसी धोखाधड़ी या दुर्भावनापूर्ण इरादे से यह जानकारी छिपाई थी। कमीशन ने बैंक की कोई प्रत्यक्ष भूमिका न पाए जाने पर HDFC बैंक को राहत दी, लेकिन HDFC लाइफ के रवैये को उपभोक्ता संरक्षण कानून, 2019 के तहत गंभीर लापरवाही माना।
तेलंगाना राज्य उपभोक्ता आयोग ने HDFC लाइफ को आदेश दिया है कि वह 45 दिनों के भीतर बीमा दावे की पूरी राशि का भुगतान करे। आयोग के निर्देश के अनुसार, कंपनी को बीमा पॉलिसी के तहत 75.31 लाख रुपए क्लेम राशि देनी होगी। इसके अलावा, सेवा में कमी और मानसिक उत्पीड़न के लिए 75 हजार रुपए हर्जाने के रूप में तथा मुकदमे और कानूनी कार्यवाही का खर्च उठाने के लिए 25 हजार रुपए अलग से अदा करने होंगे।