
Indore News : जब भी साइबर हमलों की बात होती है तो सबसे पहले वायरस, हैकिंग या सॉफ्टवेयर अटैक का ख्याल आता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि डेटा की चोरी सिर्फ सॉफ्टवेयर से ही नहीं, बल्कि हार्डवेयर के जरिए भी की जा सकती है। इसी खतरे को देखते हुए मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में स्थित देवीअहिल्य विश्व विद्यालय यानी डीएवीवी की आइईटी की फैकल्टी डॉ. प्रियंका शर्मा ने ऐसी सुरक्षित मेमोरी तकनीक विकसित की है, जो हार्डवेयर अटैक के जरिए डेटा चोरी की आशंका को काफी हद तक कम कर सकती है। इस तकनीक पर आधारित उनका शोध दुनिया के वीएलएसआइ (वेरी लार्ज स्केल इंटीग्रेशन) क्षेत्र के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
इस नवाचार का पैटेंट भी दाखिल किया जा चुका है। शोध को प्रयोगशाला स्तर पर चिप के रूप में भी विकसित किया गया है और इसका परीक्षण जारी है। क्या होता है हार्डवेयर अटैक? डॉ. प्रियंका बताती हैं कि आमतौर पर लोग समझते हैं कि हैकर कंह्रश्वयूटर या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के हार्डवेयर का विश्लेषण कर संवेदनशील जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं। किसी चिप में डेटा स्टोर होने के दौरान उसकी पॉवर खपत और करंट में होने वाले बदलावों को मापकर हैकर यह अनुमान लगा सकते हैं कि उसके अंदर कौन-सा डेटा मौजूद है। इसे तकनीकी भाषा में साइड-चैनल अटैक कहा जाता है।
मान लीजिए किसी चिप में सिर्फ दो तरह की वैल्यू स्टोर होती हैं—0 और 1। यदि '0' स्टोर होता है तो चिप कम बिजली खर्च करती है, जबकि '1' स्टोर होने पर बिजली की खपत अपेक्षाकृत अधिक होती है। अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से इन छोटे-छोटे अंतर को मापकर हैकर डेटा का अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं।
डॉ. प्रियंका ने ऐसी मेमोरी तैयार की है, जिसमें डेटा चाहे कोई भी हो, पॉवर खपत, करंट और समय (डिले) लगभग समान रहता है। यानी बाहर से देखने वाले को यह पता ही नहीं चल सकेगा कि चिप के अंदर कौनसा डेटा स्टोर है। उन्होंने बताया कि तकनीक में सिर्फ साइड-चैनल अटैक ही नहीं, बल्कि लेजर आधारित फॉल्ट अटैक जैसी तकनीकों से सुरक्षा का भी ध्यान रखा है।
यह तकनीक उन उपकरणों में उपयोगी हो सकती है, जहां डेटा सुरक्षित रखना सबसे जरूरी होता है। इनमें कंह्रश्वयूटर और लैपटॉप, ए्बेडेड सिस्टम, मेडिकल उपकरण, ऑटोमोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और अंतरिक्ष उपकरण, बैंङ्क्षकग और क्रिह्रश्वटोग्राफी सिस्टम जैसे कई क्षेत्र शामिल हैं। यह शोध केवल कागज तक सीमित नहीं है। टीम ने इस तकनीक पर आधारित चिप का डिजाइन तैयार कर उसका प्रोटोटाइप विकसित किया है। परीक्षण के बाद इसे इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों में इस्तेमाल किया जा सकेगा। यह तकनीक डॉ. प्रियंका शर्मा के पीएचडी शोध का हिस्सा है। उन्होंने बताया, यह शोध आइईटी इंदौर में डॉ. वैभव निमा के मार्गदर्शन में पूरा किया गया।