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इंदौर में 5 दिन के नवजात का बदला ब्लड ग्रुप, एक रिपोर्ट में ‘A+’ तो दूसरे में आया ‘B+’

Newborn Blood Group Changed: इंदौर में बच्चे के पिता ने मामले में सीएमएचओ को शिकायत कर की जांच की मांग की है। पैथालॉजी लैब की लापरवाही उजागर। खड़े हो रहे कई सवाल।
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इंदौर

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Akash Dewani

Sep 22, 2026

newborn blood group changed pathology lab report complaint

Newborn Blood Group Changed: 5 दिन के नवजात का बदला ब्लड ग्रुप (फोटो सोर्स- Magnific)

Indore Newborn Blood Group Changed: मध्य प्रदेश के इंदौर में पांच दिन के नवजात के ब्लड ग्रुप की जांच में दो पैथालॉजी लैब की जांच में अलग-अलग ब्लड ग्रुप रिपोर्ट जारी हो गई। एक ने ब्लड ग्रुप 'ए' पॉजिटिव बताया, दूसरी में वह 'बी' पॉजिटिव निकला। पिता के सवाल उठाने पर पहली लैब ने रिपोर्ट को गलत प्रिंट होना बताते हुए 'बी' पॉजिटिव रिपोर्ट जारी कर दी। बच्चे के पिता ने सीएमएचओ डॉ. माधव हासानी को मामले में सीएमएचओ को कॉल किया शिकायत देकर जांच की मांग की है। पर उनसे संपर्क नहीं हो सका।

मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि पैथालॉजी रिपोर्ट से ही डॉक्टर इलाज की दिशा तय करते हैं। खासकर ब्लड ग्रुप जैसी बुनियादी जानकारी में गलती सामने आना सैंपल कलेक्शन से लेकर जांच, गुणवत्ता नियंत्रण और रिपोर्ट जारी करने की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है। इंदौर में बड़ी संख्या में पैथालॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित हैं। ऐसे में सवाल यह है कि इनकी नियमित जांच और गुणवत्ता की निगरानी कितनी प्रभावी है?

पहले सैंपल में आई गड़बड़ी, फिर लिया सैंपल और बदली रिपोर्ट

शिकायतकर्ता राजपूत के मुताबिक जांच ढक्कनवाला कुआं स्थित नीरज डायग्नोस्टिक्स लैब में कराई थी। सैंपल लेने के बाद लैब से फोन आया कि पहला सैंपल सही नहीं आया, दोबारा लेना होगा। एक तकनीशियन ने घर पहुंचकर बच्चे का ब्लड सैंपल लिया। जारी रिपोर्ट में ग्रुप ए+ बताया। जब बच्चे का इलाज करने वाले डॉक्टर ने रिपोर्ट देखी तो पीलिया का स्तर भी बढ़ा दिखा। उनकी सलाह पर दूसरी बार बंगाली चौराहा में यूनिपैथ स्पेशियलिटी लैब में खून की जांच कराई। यहां रिपोर्ट बी आई। जब परिजन ने पहली लैब से संपर्क किया तो शिकायतकर्ता के अनुसार वहां रिपोर्ट को गलत प्रिंट होना बताया और बाद में बी रिपोर्ट जारी कर दी।

यहां सवाल सिर्फ रिपोर्ट का नहीं, निगरानी का भी

मामले में शिकायतकर्ता ने किसी व्यक्ति या संस्था को जांच से पहले दोषी ठहराने के बजाय पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि सैंपल कलेक्शन, सैंपल हैंडलिंग, जांच प्रक्रिया, क्वालिटी कंट्रोल और रिपोर्ट जारी करने की व्यवस्था की जांच होनी जरूरी है। मप्र की सरकारी सेवाओं में मेडिकल संस्थानों और पैथालॉजी से जुड़े नियामकीय प्रावधानों के तहत विभिन्न अनुमतियां और नवीनीकरण प्रक्रियाएं भी निर्धारित हैं। बावजूद बड़ा सवाल यह है कि इंदौर में संचालित पैथालॉजी लैब की जमीनी स्तर पर गुणवत्ता जांच कितनी नियमित होती है और गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई कितनी प्रभावी है।

एकगलती… भारीकीमत

पैथालॉजी रिपोर्ट इलाज का आधार होती है। ब्लड ग्रुप, संक्रमण, शुगर किडनी, लिवर या अन्य जांघों की रिपोर्ट में गलती होने पर मरीज को गलत उपचार, अतिरिक्त जांच या इलाज में देरी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए यह मामला केवल एक रिपोर्ट के गलत प्रिंट होने तक सीमित मानकर छोड़ने के बजाय पूरे सिस्टम की जांच का अवसर भी बनता है। अब निगाह सीएमएचओ कार्यालय की जांच पर है।

शहर की लैब व्यवस्था से जुड़े 5 बड़े सवाल…

  1. लैब में सैंपल कलेक्शन और जांच प्रक्रिया की नियमित जांच आखिर कितनी बार होती है?
  2. एक ही मरीज के ब्लड ग्रुप की दो अलग रिपोर्ट आने पर जिम्मेदारी तय करने की कोई स्पष्ट व्यवस्था है या नहीं?
  3. लैब में रिपोर्ट जारी करने से पहले क्वालिटी कंट्रोल और दोबारा सत्यापन की व्यवस्था वास्तव में लागू है या सिर्फ कागजों पर?
  4. क्या स्वास्थ्य विभाग के पास शहर की सभी पैथालॉजी लैब की जांच, शिकायत और कार्रवाई का अपडेटेड रिकॉर्ड है?
  5. अब क्या अन्य मरीजों की रिपोर्ट में भी ऐसी गलतियों की आशंका की जांच प्रशासन करेगा?