इंदौर

Indore News: ‘श्रीराम ही हैं मंदिर की अरबों की संपत्ति के असली मालिक…’, हाईकोर्ट ने पलटा 58 साल पुराना फैसला

Khachrod Shri Ram Mandir case: खाचरौद के 500 साल पुराने श्रीराम मंदिर पर 72 वर्षों से चल रहे विवाद में इंदौर हाईकोर्ट (Indore High Court) का बड़ा फैसला आया। अरबों की संपत्ति के मालिक भगवान श्रीराम माने गए।
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Aug 26, 2026
khachrod shri ram mandir case
Khachrod Shri Ram Mandir: इंदौर हाईकोर्ट ने उज्जैन जिला कोर्ट का 58 साल पुराना फैसला पलटा (फोटो सोर्स- Patrika)

Indore High Court: मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के खाचरौद में स्थित पांच सदी पुराने ऐतिहासिक श्रीराम मंदिर के प्रबंधन और पुजारी के अधिकारों को लेकर 72 वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद (Khachrod Shri Ram Mandir case) में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस विनय सराफ ने उज्जैन जिला कोर्ट के 28 जून 1968 के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके तहत मूल पुजारी रतनदास बैरागी के दावे को नामंजूर कर दिया गया था।

कोर्ट ने साफ कर दिया कि मंदिर और उसकी अरबों रुपए की चल-अचल संपत्ति के एकमात्र और वास्तविक मालिक स्वयं भगवान श्रीराम हैं। कोर्ट ने व्यवस्था दी कि इस देवस्थान का पूर्ण नियंत्रण और प्रबंधन मध्य प्रदेश सरकार के राजस्व विभाग (कलेक्टर उज्जैन) के अधीन रहेगा।

कोर्ट ने ये दिया फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि 1930 में तत्कालीन महंत मुरलीदास की प्रार्थना पर ग्वालियर रियासत के औकाफ विभाग ने मंदिर नियंत्रण अपने हाथ में लिया था. तब से यह एक सरकारी देवस्थान बन चुका है। वादी रतनदास को औकाफ विभाग द्वारा 30 अप्रैल 1948 को जो पुजारी नियुक्त करने का आदेश जारी किया गया था. वह पूरी तरह वैध है और उनके उत्तराधिकारियों को पूजा का निरंतर अधिकार है। माहेश्वरी समाज के लोग इस ऐतिहासिक मंदिर के अनन्य और परम श्रद्धालु हैं, जिन्होंने मंदिर परिसर के विकास में लाखों रुपए खर्च किए हैं। चूंकि वे आस्थावान भक्त हैं, इसलिए वादी की उन्हें मंदिर में प्रवेश से रोकने के लिए दी गई स्थायी निषेधाज्ञा की मांग खारिज की जाती है। समाज के लोग मंदिर में आकर श्रद्धापूर्वक दर्शन और पूजा कर सकेंगे।

हाईकोर्ट ने दी यह व्यवस्था…

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जिला कोर्ट की कई भूलों को भी साफ किया है:-

  1. देवता की संपत्ति पर किसी का निजी हक नहीं- देवता स्वयं कानूनन एक विधिक व्यक्ति हैं। शेबैत या महंत केवल देवता की संपत्ति के ट्रस्टी या संरक्षक होते हैं, मालिक नहीं। महंत गोपालदास या मुरली दास को यह कानूनी अधिकार नहीं था कि वे देवता की संपत्ति या मंदिर के प्रबंधन के अधिकारों को किसी वसीयत या आपसी समझौते के जरिए किसी समाज के पंचों को दान या हस्तांतरित कर सकें। ऐसा कोई भी कृत्य वैधानिक रूप से अमान्य और शून्य है।
  2. मंदिर और मठ में अंतर- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मठ वह स्थान है जहां धार्मिक और दार्शनिक शिक्षा दी जाती है। खाचरौद का देवस्थान केवल एक मंदिर है, मठ नहीं। इसलिए, यहां सेवा करने वाले पुजारी के लिए निहंग (ब्रह्मचारी) होने की कोई वैधानिक या पारंपरिक अनिवार्यता नहीं है। विवाहित व्यक्ति भी इस मंदिर में पूर्ण अधिकार के साथ पूजा-अर्चना कर सकता है।
Updated on:
26 Aug 2026 11:43 am
Published on:
26 Aug 2026 11:43 am