
Sleeping pill: नींद न आने की समस्या को लेकर कई युवा मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हैं। काउंसलिंग में पता चल रहा है कि समस्या दूर करने के लिए कई युवा अपने मन से नींद की गोली ले रहे थे। इससे वे और ज्यादा तनाव में रहने लगे। वे स्लीप डिसऑर्डर, एंग्जायटी से पीड़ित पाए गए। इसमें डर, अनिंद्रा, बेचैनी व तनाव महसूस होता है। मनोचिकित्सकों ने बताया कि मन से नींद की गोलियां लेना घातक साबित हो रहा है। शुरुआत में कम डोज से राहत मिलने पर लोग उसी दवा का नियमित इस्तेमाल करने लगे। कुछ मामलों में समय के साथ पहले जैसी नींद नहीं आने पर डोज बढ़ाने की जरूरत महसूस होने लगती है।
दवा छोड़ने पर नींद नहीं आने और बेचैनी की शिकायत रहती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, एंग्जायटी, डिप्रेशन, लगातार तनाव, भविष्य की चिंता और काम का दबाव नींद के सामान्य चक्र को प्रभावित करते हैं। मोबाइल और लैपटॉप पर देर रात तक समय बिताना समस्या बढ़ा सकता है।
34 साल के युवा को नौकरी और काम के दबाव से रात में नींद नहीं आती थी। शुरुआत में कभी-कभार नींद की गोली ली। धीरे धीरे नियमित लेने लगा। लत लगने का अहसास होने पर डॉक्टर के पास पहुंचा तो उन्होंने गोली नहीं लेने की सलाह दी। तीन माह बाद वह सामान्य स्थिति में आ सका।
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे 21 साल के युवा को भविष्य और परीक्षा परिणाम की चिंता सताने लगी। रात में बार-बार नींद खुलने और बेचैनी की शिकायत हुई। बाद में नींद की दवाओं का सहारा लेने लगा। परिजन ने मनोचिकित्सक से उपचार कराया।
23 वर्षीय युवती देर रात तक मोबाइल पर वीडियो देखती थी। सुबह देर से उठने लगी। दिन में सुस्ती रहने लगी। रात में समय पर नींद नहीं आने पर दवा लेने लगी। परिजन ने मनोचिकित्सक से काउंसलिंग कराई। अब वह ठीक होने लगी है।
एक युवा ने डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं लेना शुरू की। कुछ समय बाद डोज बढ़ाना पड़ा। दवा पर निर्भरता और दिन में सुस्ती को लेकर डॉक्टर से परामर्श लिया। उसे बिहेवियरल थेरेपी से राहत मिली
मनोचिकित्सक डॉ. वैभव चतुर्वेदी ने बताया, रात में नींद नहीं आने पर कई युवा मेडिकल से दवा लेकर इस्तेमाल शुरू कर देते हैं। नींद की कुछ दवाओं में शारीरिक निर्भरता, याददाश्त और एकाग्रता प्रभावित होने तथा दिन में सुस्ती जैसे दुष्प्रभावों का खतरा रहता है। एमवायएच के मनोचिकित्सक डॉ. राहुल माथुर ने बताया कि गोली लेने से कुछ समय के लिए नींद तो आ सकती है, लेकिन इससे समस्या की मूल वजह दूर नहीं होती।
काउंसलिंग के दौरान पता चला कि देर रात तक रील्स, सोशल मीडिया और वीडियो देखने की आदत युवाओं की बॉडी क्लॉक को प्रभावित कर रही है। स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी और लगातार मानसिक सक्रियता के कारण शरीर को सोने का संकेत देर से मिलता है। कई युवा सुबह देर से उठते हैं, दिन में सोते हैं और रात में फिर नींद नहीं आने की शिकायत करते हैं। इस तरह अनियमित दिनचर्या एक चक्र बन जाती है।