
कॉलेज के दिनों से समाजसेवा का जुनून रखने वाली रानी चंदेल ने 2018 में दो सखियों के साथ शुरू किया सफर, आज शिक्षा, महिला सशक्तीकरण से लेकर बुजुर्गों की सेवा तक पहुंचा कारवां
इंदौर। किसी बच्चे की आंखों में पढ़ने का सपना हो और संसाधनों की कमी उसे रोक रही हो… किसी बुजुर्ग को अपनों के साथ की जरूरत हो… किसी महिला को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए थोड़े सहयोग की दरकार हो… या फिर किसी परिवार के घर त्योहार की खुशियां पहुंचाने की जरूरत हो, इंदौर की रानी चंदेल और उनकी सखियों के लिए सेवा का मतलब सिर्फ मदद करना नहीं, बल्कि किसी के जीवन में थोड़ा-सा अपनापन और खुशी जोड़ना है।
रानी के मन में समाज के लिए कुछ करने का यह भाव आज का नहीं है। कॉलेज के दिनों से ही वे समाजसेवा से जुड़ी थीं और रोटरी क्लब के साथ काम किया। विवाह के बाद महाराष्ट्र के अकोला से इंदौर आईं तो घर-परिवार और बच्चों की परवरिश में व्यस्त हो गईं। जिम्मेदारियां बढ़ीं, लेकिन समाजसेवा का जुनून कम नहीं हुआ। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच भी उन्हें जब भी अवसर मिला, उन्होंने आसपास के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। कामकाजी महिलाओं के बच्चों से लेकर स्लम बस्तियों के जरूरतमंद बच्चों तक, वे शिक्षा की अलख जगाती रहीं। इस दौरान उन्होंने करीब से महसूस किया कि हर परेशानी का समाधान केवल पैसे से नहीं होता। कई बार किसी का हाथ थाम लेना, किसी की बात सुन लेना या सही समय पर छोटी-सी मदद कर देना भी किसी की जिंदगी में उम्मीद जगा सकता है।
दो सखियों के साथ शुरू हुआ सफर
वर्ष 2018 में रानी चंदेल ने अपनी सखियों साधना सिंह और गीतांजलि यादव के साथ मिलकर स्नेहशील हेल्पिंग हैंड्स वुमेंस ग्रुप की नींव रखी। शुरुआत में करीब 20 सखियां साथ थीं। किसी ने समय दिया, किसी ने आर्थिक सहयोग और किसी ने अपनी प्रतिभा। धीरे-धीरे यह छोटा-सा प्रयास एक बड़े कारवां में बदल गया। आज करीब 120 महिलाएं इस पहल से जुड़ी हैं। इन सभी की एक ही कोशिश है कि अपने आसपास किसी जरूरतमंद को अकेला महसूस न होने देना।
खुद जुटाती हैं संसाधन
समूह की एक खास बात यह है कि सामाजिक कार्यों के लिए महिलाएं स्वयं अपने स्तर पर संसाधन जुटाती हैं। उनका मानना है कि समाजसेवा के लिए किसी बड़े बजट या सरकारी मदद का इंतजार जरूरी नहीं। जितना संभव हो, उतना मिलकर किया जाए। जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा में मदद से लेकर महिलाओं को रोजगार के अवसरों से जोड़ना, स्ट्रीट वेंडर महिलाओं की सहायता करना, नेत्रहीन बच्चियों की मदद करना और जरूरतमंद परिवारों तक सहयोग पहुंचाना, समूह ने सेवा के कई आयामों को छुआ है। अनाथ आश्रम और वृद्धाश्रमों में सेवा कार्यों का सिलसिला जारी रहा।
त्योहार तब पूरा, जब खुशियां सबके घर पहुंचें
समूह की महिलाएं त्योहारों की खुशियां भी उन परिवारों के साथ साझा करती हैं, जो आर्थिक कारणों से इनसे दूर रह जाते हैं। दीपावली पर कच्ची बस्तियों में रहने वाले परिवारों के बीच मिठाई और पटाखे बांटना भी इसी सोच का हिस्सा है। उनके लिए त्योहार सिर्फ अपने घर को रोशन करने का अवसर नहीं, बल्कि किसी और के घर में भी उम्मीद का दीप जलाने का मौका है।
शिक्षा और सुरक्षा… दोनों पर जोर
रानी चंदेल और उनकी सखियों का मानना है कि समाजसेवा का स्थायी असर तभी होगा, जब लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जाए। इसलिए बच्चों की शिक्षा के साथ महिलाओं और युवतियों के सशक्तीकरण पर भी काम किया जा रहा है। महिलाओं और युवतियों को सेल्फ डिफेंस के प्रति जागरूक करने के साथ ही पारंपरिक उत्सवों और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से भारतीय परंपराओं से जोड़ने का प्रयास भी किया जाता है। रानी चंदेल अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना महासभा से भी जुड़ी हैं और महिला सशक्तीकरण से जुड़े कार्यों में सक्रिय रहती हैं।